280 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
भी समझें जिसके लिये हम यह विधान बना रहे हैं; इसकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात है : इसकी परिवर्तनशीलता। यह संक्रमण की अवस्था में है। जो बात हमारे समाज को व्यापक रूप से प्रभावित कर रही है यदि उसका उल्लेख किया जाये तो वो ये है कि इन 25 वर्षों में हमारे समाज की बहनों में बहुत जागृति आई है। वे अपने न्यायोचित अधिकारों के सम्बन्ध में सजग हो गई हैं और न्यायोचित मांगों के समर्थन में संगठित प्रयास कर रही हैं। इस विधेयक को हमारे समक्ष रखने का श्रेय इन्हीं शिक्षित एवं सुसंस्कृत महिलाओं को है। लेकिन इसके साथ हमें इस तथ्य को भी ध्यान में रखना है कि महिलाओं में शिक्षा का प्रसार तेजी से हो रहा है....
श्री आर. के. चौधरी : आपका तात्पर्य पाश्चात्य शिक्षा से है?
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पं. कुंजरू : जो शिक्षा आपने प्राप्त की है और इसके बावजूद आप एक अच्छा हिंदू होने का दावा करते हैं। हमारी बहनें भी ऐसी ही शिक्षा प्राप्त कर रही हैं और यह मानने का कोई औचित्य नहीं है कि वे भारतीय नहीं रहेंगी या वे अपने धर्म या संस्कृति के प्रति असम्मान भाव अपनायेंगी। शिक्षित स्त्रियों की संख्या निरन्तर बढ़ रही है। वे पुरुषों के समान ही मतदान के अधिकार का उपयोग करेंगी। क्या आप समझते हैं कि किसी समाज में महिलाओं और पुरुषों के बीच असमानता पैदा करने वाली बातों को ज्यादा समय तक बर्दाश्त किया जायेगा? जो लोग धर्म के नाम पर सामाजिक अन्याय एवं असमानता को प्रश्रय दे रहे हैं वे हिंदू धर्म की अत्यधिक हानि कर रहे हैं। मैं यह कहना चाहता हूँ कि इस सत्र के दौरान विधेयक के जिन उपबन्धों पर हम चर्चा करने जा रहे हैं वे किसी भी तरह हिंदू कानून के सिद्धांतों के विपरीत नहीं हैं।
विधेयक की वे मुख्य बातें क्या हैं जिन पर इस समय चर्चा चल रही है। वे हैं-एक विवाह और तलाक। जहाँ तक विवाह का सम्बन्ध है मेरे मित्र डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने कल यह उचित ही कहा कि विगत में जो घटा है उसको लेकर आज ये बात निरर्थक है कि संसद सामाजिक सुधार के मामलों में कानून बनाने में सक्षम नहीं थी। उन्होंने यह भी कहा कि वे इस विवाह सम्बन्धी विधेयक का समर्थन करने को तैयार है बशर्तें मुसलमानों को भी इस विधेयक के अन्तर्गत लाया जाए। मुझे अच्छी तरह याद है कि जब इस विधेयक के सामान्य सिद्धान्तों पर चर्चा हो रही थी तब कुछ वक्ताओं ने यह आशंका व्यक्त की थी कि उत्तराधिकार के मामले में हिंदूओं को मुसलमानों की नकल करने के लिये बाध्य किया जा सकता है। हम जानते हैं कि मुसलमानों में पिता की सम्पत्ति में पुत्रियों का अधिकार होता है। फिर भी, इस मामले में हम हिंदू तथा मुसलमानों में एकत्व स्थापित करने के पक्ष में नहीं थे तो अब हमें यह कहने का क्या अधिकार है कि हिंदू विवाह के सम्बन्ध में तब तक कोई विधान न बनाया जाये जब तक यह समान रूप से मुसलमानों पर भी लागू न हो? आज जो तर्क दिये जा रहे हैं,