हिंदू संहिता जारी.... खंड : 2 (संहिता की प्रयोज्यता) : जारी - Page 296

281

हिंदू विधि समिति ने उन पर बहुत ही ध्यानपूर्वक विचार किया था। मैं सदन को याद दिलाना चाहूँगा कि आपत्तियों पर बारीकी से विचार करने के पश्चात् समिति ने उन पर क्या टिप्पणी की। समिति ने निष्कर्ष निकाला कि ये आपत्तियां या तो निराधार हैं या इनका इन तथ्यों से कोई संबंध नहीं है। समिति ने आगे कहा :-

‘‘तदनुरूप हमने प्रारूप संहिता में एक विवाह के प्रावधान को बनाये रखने का निश्चय किया है। इससे पति द्वारा जब चाहे पत्नी का त्याग तथा दूसरे विवाह करने पर अंकुश लगेगा। हमारे पास पत्नियों को त्यागने और पुनर्विवाह करने की संख्या में वृद्धि के ठोस प्रमाण हैं और इस समस्या का सर्वोत्तम समाधान यह है कि इस पर एक विवाह सम्बन्धी कानून बना दिया जाये।’’

मैं समझता हूँ कि समिति की यह टिप्पणी काफी प्रभावपूर्ण है और वे व्यक्ति जो एक विवाह का किसी भी आधार पर विरोध करते हैं उन्हें समिति द्वारा एक विवाह के पक्ष में रखे गये तर्कों का उत्तर देना चाहिये। समिति ने इस ओर ध्यान आकर्षित किया है कि बम्बई राज्य में विधि द्वारा एक विवाह को लागू कर दिया गया है। 4 या 5 वर्ष पहले वहां हिंदुओं में बहुविवाह को रोकने के लिये कानून बनाया गया था। मद्रास राज्य में भी ऐसा ही कानून है। बड़ौदा राज्य जहाँ का राजा हिंदू था और बहुसंख्यक प्रजा भी हिंदू थी, ने कई वर्ष पहले एक विवाह तथा विवाह-विच्छेद के पक्ष में कानून बनाया था।

श्री डी. डी. पन्त (उत्तर प्रदेश) : राजा ने इसका उल्लंघन किया।

¼mÙk j
çn s'k

पं. कुंजरू : यदि इन सभी स्थानों पर हिंदुओं ने हिंदू-कानून का उल्लंघन किया है-तो सच्चे हिंदू कहाँ मिलेंगे - केवल इस सदन में?

कल यह मांग रखी गई थी कि विधेयक को अनुमति देने वाला विधेयक मान लिया जाये अर्थात् इसके उपबन्धों को लागू करने का अधिकार राज्य सरकार पर छोड़ दिया जाये। दो महत्वपूर्ण राज्यों में एक विवाह का सिद्धांत पहले से ही लागू है। मलाबार क्षेत्र तथा त्रावणकोर-कोचीन राज्य में भी बहु-विवाह रोकने हेतु कानून बनाया गया है। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुये तथा कल की चर्चा में इस तथ्य को बार-बार स्वीकार किये जाने के बावजूद कि अधिकतर विवाह, एक विवाह होते हैं, अब कोई भी व्यक्ति इस बात पर कैसे जोर दे सकता है कि एक विवाह से सम्बन्धित प्रावधान को ऐच्छिक बना दिया जाये? विधेयक का यह एक मात्र प्रावधान है जो ऐच्छिक न होकर अनिवार्य है और ऐसा होना लाजिमी भी है। ऐसा लगता है कि इसकी अनिवार्यता को अधिकतर हिंदुओं ने स्वीकार कर लिया है। जहाँ तक यह