हिंदू संहिता जारी.... खंड : 2 (संहिता की प्रयोज्यता) : जारी - Page 297

282 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कानून लागू है वहाँ पर हिंदू विधि का उच्छेद नहीं हुआ है वहां के हिंदू भी इतने ही अच्छे हैं जितने की यहाँ के। इसलिये जब मेरे माननीय मित्र डॉ. अम्बेडकर एक विवाह को हिंदुओं में कानूनी रूप देने को कहते हैं तो वे ठोस धरातल पर खड़े हैं।

दूसरा प्रश्न तलाक का है। यहाँ भी लोग इसके उपबन्धों को ऐच्छिक बनाने को कहते हैं किन्तु वे पहले से ही ऐच्छिक हैं। नाखुश दम्पत्तियों के लिये यह विवशता नहीं है कि उन्हें इस विधि के पारित होने के पश्चात् न्यायालयों में दौड़ना पड़ेगा तथा तत्काल ही तलाक करना पड़ेगा। यह उन पर निर्भर करता है कि वे विधि के प्रावधानों का लाभ उठाते हैं या नहीं। उन व्यक्तियों के मन से जो विच्छेदन या तलाक की वर्तमान जटिलताओं से परेशान हैं, भय को दूर करने और उन्हें सक्षम बनाने के लिये और क्या किया जा सकता है? हिंदू विधि समिति ने इस प्रश्न पर कहा है : ‘‘हमारे सामने लाये गये साक्ष्य से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि ब्रिटिश भारत में ऐसी हजारों महिलाएँ हैं जिन्हें उनके पतियों ने त्याग दिया है।’’

समिति आगे कहती है :-

‘‘दूसरे साक्ष्यों द्वारा बहुत से कठिन मामले हमारे सामने लाये गये हैं जिनमें पुनर्विवाह अभिलाषित तथा संभव था। लेकिन वर्तमान विधि के कारण सम्पादित नहीं हो सका। हो सकता है ऐसे मामलों की संख्या अधिक न हो और यह समस्या भी अधिक भयावह न हो। लेकिन जैसा कि हम पहले ही बता चुके हैं कि भारत में इस तरह के हजारों मामले हैं और यदि इन महिलाओं में से कुछ महिलाएं ही पुनर्विवाह के उद्देश्य से तलाक की इच्छा प्रकट करती हैं तो प्रश्न यह है कि क्या कानून उन्हें ऐसा करने से रोकेगा? हमारे सामने ऐसे प्रमाण भी लाये गये हैं कि बहुत से मामलों में चुपचाप पुनर्विवाह हुए हैं और समाज ने ऐसे पुनर्विवाह को स्वीकार किया है और मान्यता भी दी है।’’

यहां, जो तथ्य पेश किये गये हैं। वे निर्विवाद रूप से इस दृष्टिकोण के विरुद्ध हैं कि हमारे विवाह विधि में तलाक के प्रावधान भी आवश्यक नहीं हैं। यह कानून किसी को तलाक देने के लिए विवश नहीं करता यह तो कोई कारण नहीं कि लोग चुपचाप कष्ट उठा लेते हैं इसलिए उन्हें भी कष्ट भोगने दिया जाये जो उससे निजात पाना चाहते हैं। मैं पहले ही ऐसे कुछ राज्यों का उल्लेख कर चुका हूँ जहां एक विवाह कानून लागू है। मैं एक बात और स्पष्ट कर दूँ कि जिन राज्यों का मैंने उल्लेख किया है उन सभी राज्यों में एक विवाह प्रथा में भी कानून तलाक का प्रावधान है तो क्या इससे विवाह की पवित्रता पर फर्क पड़ेगा? क्या इससे यह साबित होगा कि उन राज्यों के हिंदू अपने धर्म और संस्कृति का सम्मान नहीं करते?

पं. मैत्रा : इसका उदाहरण यहां है।