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पं. कुंजरू : मैं चाहता हूँ जिन राज्यों का मैंने उल्लेख किया है उन राज्यों के लोगों और मेरे माननीय मित्र पं. मैत्रा का इस विषय पर संवाद हो। शायद तब उन्हें पता चल जायेगा कि वे लोग अपने आप को हिंदू संस्कृति, रीति-रिवाजों के मामलों में किसी भी तरह हीन नहीं समझते।
पं. मैत्रा : तो इस पर उन क्षेत्रों द्वारा कानून बनाने के लिये क्यों नहीं छोड़ दिया जाता : इसे अभी जबर्दस्ती क्यों थोपा जा रहा है?
पं. कुंजरू : मैं पहले ही बता चुका हूँ कि यह कानून कई राज्यों में लागू है। मैंने यह भी स्पष्ट किया है कि यह प्रावधान ऐच्छिक होगा। अब आप यह कह रहे हैं कि एक ऐच्छिक होना चाहिये, इससे आप का क्या तात्पर्य है?
पं. मैत्रा : यह सभी के लिये ऐच्छिक हो।
पं. कुंजरू : इस विधि के अधीन असंतुष्ट दम्पत्तियों को मुक्ति पाने का ऐच्छिक अधिकार होगा। कोई उनको पृथक होने अथवा तलाक देने के लिये विवश नहीं करता। आप और क्या चाहते हैं?
बड़ौदा राज्य में यह कानून बम्बई और मद्रास राज्यों की अपेक्षा लम्बे समय से लागू है। लेकिन हिंदू विधि समिति के समक्ष दिये गये साक्ष्य से ऐसा प्रतीत होता है कि 1940-41 तथा 1941-42 में उन जातियों के लोगों द्वारा दायर मुकदमों की संख्या केवल 3 थी। जिन जातियों में तलाक देने की प्रथा नहीं है। कल मेरे माननीय मित्र डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने कहा था कि 90 प्रतिशत व्यक्तियों को पूर्व से ही तलाक अधिकार प्राप्त हैं तो उन शेष 10 प्रतिशत व्यक्तियों के लिये, जो इसे अविच्छेद समझते हैं, इसकी क्या आवश्यकता है? लेकिन मुझे दुःख है कि उनका यह कथन सही नहीं है।
हम सभी बातों से अवगत हैं कि हिंदू समाज में क्या हो रहा है। यदि एक पति शराब पी कर अपनी पत्नी को पीटता है अथवा त्याग देता है तो क्या यह कोई सांस्कारिक कार्य है? क्या यह हिंदू विवाह के पवित्र लक्षणों के अनुकूल है? मेरे पीछे बैठे एक सदस्य पूछ रहे हैं : ‘‘इस पर अंकुश क्यों नहीं लगाते?’’
पं. मैत्रा : पत्नियां भी तो पति को पीटती हैं।
पं. कुंजरू : मैं ये नहीं कहता कि पत्नियां निर्दोष होती हैं। पत्नियों में भी दोष होते हैं, लेकिन यह कानून केवल पत्नियों के लिये ही नहीं अपितु पतियों के लिये भी मान्य होगा। इसलिये यह दावा करना व्यर्थ है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य जातियों के व्यक्ति अन्य जातियों से श्रेष्ठ होते हैं। यहाँ यह भी कहा गया है कि