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* श्री भट्ट : (संवाद का अंग्रेजी अनुवाद) उपाध्यक्ष महोदय, मुझसे यह कहा जाता है कि मैं अंग्रेजी में बोलूँ, लेकिन यह मेरी बदकिस्मती है कि मैं अंग्रेजी में बोल नहीं सकता हूँ और जो भावना और जो भाव मैं हिन्दुस्तानी में दर्शा सकता हूँ, वह बात मैं अंग्रेजी में ठीक ढंग से नहीं बतला सकता हूँ, इसलिये मैं माफी चाहता हूँ।
श्री आर. के. चौधरी : उपाध्यक्ष महोदय, हम तीव्र गति से बोली गई धारा प्रवाह
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हिंदी नहीं समझ सकते। हम इसे तभी समझ सकते हैं यदि कोई धीरे-धीरे बोले।
श्री भट्ट : मैं यहां पर केवल मंत्री जी को जवाब देने के लिये ही नहीं खड़ा हुआ हूँ, मैं अपनी बात कहने के लिये यहां खड़ा हुआ हूँ। हम एक बड़ा काम करने जा रहे हैं और भागीरथ प्रयत्न करने जा रहे हैं, क्योंकि हम भारत की संतान हैं, भागीरथ की संतान हैं, राम-कृष्ण के वंशज हैं और मनु और याज्ञवल्क्य की संतान हैं और यह एकीकरण का नाम, हिंदू शास्त्र को एक जगह लाना और हिंदू शास्त्र को ऐसा बनाना जो हमारे व्यवहार में काम में आ जाये और जो यह संहिताकरण करना चाहते हैं। यह काम बहुत बड़ी भागीदारी का काम है। जैसा कि श्री गौड़ ने इंग्लैंड के बारे में कहा है :
‘‘इंग्लैंड के कानूनों को संहिताबद्ध करने के कई प्रयास किये गए हैं लेकिन सारे प्रयास असफल रहे हैं।’’
इंग्लैंड एक प्रगतिशील देश है फिर भी वहां ऐसा एकीकरण नहीं हो सकता। हमारे देश में जहाँ इतनी असंगतियां और पेचीदगियां हैं, जहाँ अलग-अलग रीति-रिवाज हैं वहां यह एक भगीरथ कार्य है। जैसे कि हमारे माननीय मंत्री काका साहिब गाडगिल ने कहा है कि यदि हम ऐसा भगीरथ कार्य नहीं करेंगे तो हम गंगा-युमना भगीरथ जैसे कहां से बहायेंगे। मैं उन्हें उनके इस पुरुषार्थ पर बधाई देता हूँ। हम भी उनके इस कार्य में उनकी मदद करना चाहते हैं, उसमें रोड़ा अटकाना नहीं चाहते। मैं सिर्फ यही कहना चाहता हूँ कि प्रत्येक कार्य को सही समय पर उचित ढंग से किया जाये। हम ये नहीं कहते कि हिंदू शास्त्रों की जो अहमियत है और उसमें जो पवित्रता है पंडित कुंजरू उसे वो ले लेना चाहते हैं, लेकिन हम ये भी नहीं चाहते हैं कि हम पूरी तरह से भौतिकता की ओर उन्मुख हो जायें। और हम प्रत्येक वस्तु को अपनी सुविधा की दृष्टि से देखें। हम यह नहीं चाहते कि उनका यह कानून भविष्य में निष्प्रभावी साबित हो। हिंदू शास्त्र में भी संशोधन किये गये हैं। आज कुछ व्यक्ति डॉ. अम्बेडकर को मनु कहते हैं, गाडविल को याज्ञवल्क्य कहते हैं और गाडगिल साहब नज़ीरुद्दीन अहमद को इसी तरह का कोई और नाम दे सकते हैं।
* संसदीय वाद-विवाद खंड- XV, भाग II, 18 सितंबर, 1951 पृष्ठ 2815-35