286 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
श्री श्यामनंदन सहाय (बिहार) : इनको नारद कह दीजिये।
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श्री भट्ट : यह कहना मुश्किल है कि हमने प्रगति की है या पिछड़ गये हैं। कोई मुझसे यह पूछे कि खान-पान, कपड़े और रहन-सहन के लिहाज से हम मुगल राज्य में जैसे थे, वैसे आज हैं। क्या डेढ़ सौ साल पहले हम जिस प्रकार का जीवन बिता रहे थे, उसी प्रकार जीवन हमारा आज है? तीस साल पहले जिस प्रकार की सुविधाएँ हमें थीं वो सुविधाएँ क्या आज हैं? यदि हमारी प्रगति की कसौटी इन सबको माना जाये तो हम ये नहीं कह सकते कि हमने प्रगति की है। क्या हम यह कहेंगे कि हाँ, हमने प्रगति की है क्योंकि हमने पहले से अधिक कानून बनाये हैं या हम कहेंगे कि हाँ, हमनें प्रगति की है क्योंकि हमने पहले से अधिक स्वस्थ और पुरुषार्थी हुए हैं और यह कि हम सच्चे आर्य बने हैं। ये एक मुश्किल सवाल है और इसका जवाब मैं नहीं दे सकता और इसके लिये अभी मेरे पास समय भी नहीं है। यह एक अलहदा विषय है और इस समय मैं अलग-अलग विषयों में नहीं जाना चाहता। मैं अपनी बात स्वयं द्वारा रखे गये संशोधनों और धारा-2 तक सीमित रखना चाहता हूँ। हमारी स्मृतियां और शास्त्र समय-समय पर बदलते रहते हैं। मैं मंत्री महोदय की इस बात से सहमत हूँ कि हमारे धर्म शास्त्र हैं, उनकी परिभाषा हमारे मैत्रा साहब कुछ करें, गाडगिल साहब कुछ करें, अम्बेडकर साहब अपना एक अलग भाष्य रखें और मेरी कल्पना हालांकि मैं कोई भाष्यकार नहीं हूँ- अलग हो, पर मैं ये जरूर कहना चाहता हूँ कि हमारा धर्म, हमारी स्मृति और हमारे शास्त्र सनातन रहे हैं। इनमें परिवर्तन होता रहा है और जैसे-जैसे समय परिवर्तित हुआ है उनमें भी नवीनता आती रही है। वे देश और काल के साथ-साथ परिवर्तित होते रहे हैं और वे कभी रूढ़ नहीं रहे। मैं किसी दूसरे धर्म या सम्प्रदाय के ग्रन्थों की निंदा न करते हुए यही कहना चाहता हूँ कि हिंदू शास्त्र और परम्परा आज भी जिन्दा है और यही कारण है कि हिन्दुत्व प्रत्येक काल में अपना अस्तित्व बनाये रख सका। इसको मैं इसी अर्थ में सनातन मानता हूँ।
पंडित मालवीय : जब यह संहिता पारित हो जायगी तो ऐसा नहीं रहेगा।
श्री भट्ट : हम डराना नहीं चाहते। मुझे याद है जब हिंदू संहिता विधेयक समिति ने इसका प्रारूप तैयार किया और जब इसे अप्रैल, 1947 में सदन में पेश किया गया तब उसके उद्देश्य और प्रयोजन संबंधी वक्तव्य में कहा गया था कि ‘‘संहिताबद्ध करने तथा एकरूप बनाने के लिए जनमत बढ़ता जा रहा है।’’ इसके अलावा हमारे माननीय काका साहेब ने भी कहा है कि ‘‘यह कहना मुश्किल है कि कौन पक्ष मज़बूत है।’’
माननीय उपाध्यक्ष : सरकारी प्रतिवेदन में कोई यह कैसे समझेगा कि ‘काका साहेब’ कौन हैं?