287
श्री भट्ट : मैं आपका आशय समझता हूँ। जैसा कि काका साहेब अर्थात् हमारे माननीय मंत्री श्री गाडगिल ने अभी-अभी कहा है और कल कुछ अन्य सदस्यों ने भी कहा था कि जो लोग अंग्रेजी पढ़े-लिखे हैं या जो अंग्रेजी पढ़े-लिखे नहीं भी हैं लेकिन प्रगतिशील विचार रखते हैं, वे भी इससे सहमत हैं। यदि ऐसा होता तो इस विधेयक के खिलाफ केवल विरोध-प्रदर्शन क्यों होते? दोनों पक्षों की ओर से प्रदर्शन होता। हमारे संसद भवन के चारों और इस विधेयक के पक्षधर और विरोधी दोनों ही प्रदर्शन करते। मैं जानता हूँ कि दोनों पक्षों में विद्वान और समझदार व्यक्ति हैं।
डॉ. अम्बेडकर : वे सब पागल हैं, और वे बाहर इसलिए हैं क्योंकि हमारे पागलखानों में इनके लिए स्थान नहीं हैं।
श्री भट्ट : हमारे माननीय डॉ. अम्बेडकर साहब यह कहते हैं कि जो विरोध कर रहे हैं, वे पागल हैं। मैं बड़े अदब के साथ यह कहना चाहता हूँ कि मैं उनके इस वाक्य का विरोध करता हूँ। यदि आप उनको पागल कहते हैं तो वे आपको सौ गुणा अधिक पागल कहेंगे। मैं दावे के साथ कहना चाहता हूँ कि अगर कोई आदमी अपने विरोधी को पागल कहे तो मेरी समझ से वह ऐसे जमाने में रह रहा है जिससे हम सब ऊब चुके हैं। ब्रिटिश सल्तनत का ज़माना एक ऐसी सरकार का जमाना था जो न तो कभी दूसरे के विचारों को सुनती और न ही उन्हें बर्दाश्त करती थी। मैं डॉ. अम्बेडकर जिन्हें आज का मनु बताया जा रहा है, के इस कथन से सहमत नहीं हूँ कि उनके विरोधी पागल हैं और वे इसलिए पागलखाने से बाहर हैं क्योंकि वहां उनके लिए जगह नहीं हैं। मैं मानता हूँ....
श्री आर. के. चौधरी : सदस्य महोदय हिन्दी में बोल रहे हैं इसलिए सारा मजा किरकिरा हो रहा है। जो हिन्दी जानते हैं। वे तो समझ रहे हैं। लेकिन मेरी समझ में एक बात भी नहीं आ रही है।
पंडित मालवीय : यह मज़े की बात नहीं अपितु एक क्रूर मज़ाक है।
पंडित ठाकुरदास भार्गव (पंजाब) : मेरे माननीय मित्र की समझ में नहीं आ रहा, अन्यथा वे डॉ. अम्बेडकर के कथनानुसार इस समय कहीं और ही होते।
श्री आर. के. चौधरी : मैं समझ गया डॉ. अम्बेडकर कह रहे थे कि वे लोग जो विधेयक का विरोध कर रहे हैं, वे पागल हैं। क्यों मैं ठीक कह रहा हूँ?
माननीय उपाध्यक्ष : उन्होंने ऐसा नहीं कहा।
श्री भट्ट : मैं कह रहा था कि हो सकता है डॉ. अम्बेडकर के विचार कुछ और हों और मेरे विचार उनसे अलग हों। लेकिन मैं यह कहना चाहता हूँ कि 1948 के