हिंदू संहिता जारी.... खंड : 2 (संहिता की प्रयोज्यता) : जारी - Page 303

288 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

बाद यह विधेयक प्रवर समिति को भेजा गया। प्रवर समिति ने अगस्त 1948 में अपनी रिपोर्ट पेश की। उसके बाद इस विधेयक पर पुनः चर्चा शुरू हो गयी। महोदय, जैसा आप जानते हैं कि हमारी सरकार किसी की भावनाओं को चोट नहीं पहुंचाना चाहती और न ही यह कुछ ऐसा करना चाहती है जिससे लोगों में एकदम खलबली मच जाये। इसलिये हमारी सरकार ने पंडितों से भी विचार-विमर्श किया। डॉ. अम्बेडकर ने उन पंडितों की बात भी सुनी जो इस विषय पर कुछ कहना चाहते थे। उन्होंने उन्हें अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करने का मौका दिया हालांकि इससे वे संतुष्ट नहीं हुये। लेकिन कुछ भी हो उन्हें मौका तो दिया गया। उनकी बात मानी गई या नहीं, यह मुझे नहीं मालूम। लेकिन इसके बाद एक नई चीज़ हमारे सामने लायी गई और उसमें संशोधन किया गया। अब इसमें दिन-प्रतिदिन नये-नये संशोधन किये जा रहे हैं और यह अच्छी बात है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। वह चाहते हैं कि जहां तक हो सके विरोधियों को समझा कर, उनकी शिकायतों को ध्यान में रखकर, एक ऐसा कानून बनाया जाये जो सब को मंजूर हो। इसी बात को ध्यान में रखकर सरकार ने यह विधेयक पेश किया है। और हम इसी की धारा-2 पर चर्चा कर रहे हैं। इस विधेयक में बहुत सी भिन्न बातें सम्मिलित हैं लेकिन जहाँ तक मैं समझता हूँ कि इस समय केवल दो बातें अर्थात् विवाह और तलाक पर चर्चा की जानी चाहिए। यदि हम एक ही बात को उठाये जा रहे हैं जैसा कि श्री गाडगिल ने सुझाव दिया है और यह आशा व्यक्त की है कि इससे हम अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर सकेंगे, तो मैं उनसे अनुरोध करना चाहूँगा कि यदि उनमें थोड़ी-सी भी सूझ-बूझ है तो वे रुक जायें। मैंने अपने पहले भाषण में जो बात कही थी वही फिर कह रहा हूँ और वो यह कि अगले चार-पाँच महीनों में जब तक नयी लोकसभा का गठन नहीं हो जाता, सरकार को इन्तजार करना चाहिये। आगामी लोकसभा के लिये जो सदस्य चुने जायेंगे वे लोग इस बात को अपने मतदाताओं के सामने, लोगों के सामने रखेंगे। ये एक बहुत ही ज्वलन्त प्रश्न बन गया है और यह बात हमेशा उनके सामने रहेगी। इस सवाल को जनता के सामने रहने दिया जाये और फिर जो आएंगे वो जनता का आदेश ले कर आएंगे और फिर जो सदस्य आगामी लोकसभा के लिये चुन कर आयेंगे वे इस मुद्दे पर जनता का आदेश ले कर आयेंगे या फिर वे जनता को यह बताएंगे कि हम इस मुद्दे पर क्या करने जा रहे हैं। कायदे आज़म जिन्ना साहब ने बाल-विवाह विरोध विधेयक पर बोलते हुए 1929 में कहा था, ‘‘यह आवश्यक है कि चौदह वर्ष से कम आयु के बच्चों को विवाह की अनुमति न दी जाये। यदि मेरे मतदाता मेरे इस विचार से सहमत नहीं हैं तो मैं सभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दूँगा और फिर मतदाता किसी अन्य व्यक्ति को अपना प्रतिनिधि चुन सकते हैं।’’ हम क्या चाहते हैं इस बारे में हमारा निश्चय दृढ़ होना चाहिये। हमें यह हिसाब-किताब नहीं करना चाहिये कि अब