292 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
यथा संभव परहेज एवं सावधानी प्रयोग में लायी जाये तथा विवाह एवं भोजन के संबंध में यथासंभव शुद्धता एवं स्वच्छता बरती जाये। केवल एक जैसी प्रकृति, आदत एवं स्वभाव के लोगों के ही साथ भोजन एवं विवाह करना चाहिए जिससे व्यक्तिगत तथा जातीय स्वास्थ्य तथा सुख की वृद्धि हो।’’
मैं खाने-पीने में कुछ ज्यादा असलियत नहीं देखता हूँ। महात्मा गांधी जी से पहले भी मैं इस चीज को नहीं मानता था। लेकिन अगर आप कहेंगे कि एक मछली
खाने वाला बैठा है उसके साथ खाइये तो मैं यही कहूँगा कि मुझे माफ कीजिये। मैं यह नहीं मानता कि वह अस्पृश्य है लेकिन मेरी एक आदत पड़ गयी है। कोई कहे कि फलां औरत से शादी कर लो....
डॉ. अम्बेडकर : इतनी मछलियां कहां हैं कि सब को बांटी जायें?
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श्री भट्ट : मैं जनसंख्या सम्बन्धी आंकड़े देख रहा था और मैं अपने मित्र श्री सिधवा जी से और दूसरे मित्रों में माफी चाहूँगा यह कहने के लिए कि उसमें मैंने देखा कि कुछ 60 साल के आदमियों ने शादी की है। मैं तो शादी नहीं करना चाहता हूँ।
तो मैं अजऱ् कर रहा था कि रहन-सहन और शादी-विवाह कोई जबरदस्ती की बात नहीं है। यह तो अपने-अपने स्वभाव के अनुकूल होनी चाहिए। और अगर आज ऐसा नहीं होता है तो कल तो जायेगा, यह मुझे विश्वास है। आज हमारा विश्वास है कि हमारे पंडित जी जो काम करेंगे वह देश को ध्यान में रखकर करेंगे, इसीलिए हम उनको नेता मानते हैं। बिना विश्वास के तो हम उन्हें नेता नहीं मानते। इसी तरह हमें अपने माता-पिता पर विश्वास है कि वह हमारे लिए जो करेंगे वह ठीक ही करेंगे, और अगर हमको उन पर विश्वास नहीं है तो हम खुद ढूँढ़ंगे, लेकिन जब हम ऐसा करेंगे तो हम अपने स्वभाव, और आदत और सुविधा सब को देखकर पसन्द करेंगे। इसलिए हमारा जो विश्वास बना हुआ है वह इन बातों पर आधारित है और इसलिए हमें कोई ऐसा कानून नहीं बनाना चाहिए कि जिससे समाज में मुश्किलें पैदा हों या असंतोष फैले। आखिर कानून बनाने का अर्थ तो यह है कि समाज को सुख पहुंचे और समाज समृद्ध हो। लेकिन यदि समाज के लोग यह कहें कि आपके कानून से हमारी बर्बादी हो रही है तो आप उनको समझायें। यदि डॉ. अम्बेडकर उस विधेयक के लिए इतने उतावले हैं तो वे एक लाख आदमियों के बीच इस हिंदू संहिता विधेयक को समझायें और उसी समय विधेयक का विरोध करने वाला कोई पंडित भी आकर समझाये। फिर वे एक लाख आदमी गुप्त मतदान से अपनी राय प्रकट करें, तब तो आपको संतोष होगा।
श्री नज़ीरुद्दीन : खत्म हो जायेंगे।
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