हिंदू संहिता जारी.... खंड : 2 (संहिता की प्रयोज्यता) : जारी - Page 310

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होने चाहिए थे। लेकिन मुझे अपने विचार समाज को साथ में रख कर आगे बढ़ाने हैं।’’ इसी तरह आपके कितने ही ऊंचे विचार हों, कितने ही सुख लाने वाले विचार हों, लेकिन अम्बेडकर साहब, जब हम आप के साथ नहीं होंगे तो क्या आप के 15, 20 या 25 मंत्रिमंडल के सदस्य जो हैं उन्हीं से क्या आपका काम चल जायेगा? अगर हम भी यह कहें कि हम आप के साथ हैं, जैसा कि बहुमत वाले कह देते हैं क्योंकि वे सोचते हैं पंडित जी कह रहे हैं इसलिये मान जाओ, डॉ. अम्बेडकर कह रहे हैं इसलिये मान लो। लेकिन अगर मैं मान जाऊं तो मेरे पीछे कौन आयेगा? मैं आपके सामने फिर दोहरा दे रहा हूँ कि अगर मैं आपको सच्ची बात न बताऊं और मैं यह न कहूँ कि समाज इस चीज को इस तरह से नहीं चाहता है, तो मैं आपको धोखा दे रहा हूँ। मैं आपको धोखा देना नहीं चाहता। इसलिये जैसे आपके पीछे हम हैं इसी तरह हमारे पीछे हमारे मतदाता हैं। उनकी सुविधा और उनके कल्याण को भी हमें देखना है। आपको यह कहावत पता होगी : ‘‘शास्त्राद् रूढि़ बलियसी’’ अर्थात् रूढि़ शास्त्रों से भी अधिक बलवान है तो फिर यह कानून कौन सी चीज है। आपके कानून भी मनुष्य के बनाये हुये हैं और वह शास्त्र भी मनुष्य के बनाये हुये थे। अगर उन शास्त्रों पर हमारी रूढि़यों का इतना प्राबल्य था तो क्या बात है कि हमारे कानून पर हमारे समाज का प्राबल्य नहीं होना चाहिये? आप इस बात पर सोचें।

इसमें एक और कमी है। डॉ. साहब मुझे माफ करेंगे और कुंजरू साहब तो अब अपनी सीट पर नहीं हैं। हम लोग ऐसे अंधे हो गये हैं कि जब पश्चिम वाले कहेंगे कि अरे भाई आप के मैरिज लाज़ (विवाह संबंधी कानून) और आप की मैरिज़ सैरेमोनीज़ (विवाह अनुष्ठान) तो बहुत अच्छी चीजें हैं तब हम कहेंगे, हां, हां। जब मैक्स मूलर आ कर कहेगा कि आपके शास्त्र, आपके उपनिषद आपके वेद आला दर्जे के हैं तो हम कहेंगे : हां, यह सच्ची बात है और फिर हम उसी से उद्धरण देंगे। लेकिन हमारे भाष्यकार आचार्य भले ही उनसे अच्छे शब्दों में कह गये हों, पर उनकी पोथियों को कौन देखे?

मुझे अभी-अभी बताया गया है कि सारे दिल्ली शहर में ‘याज्ञवल्क्य स्मृति’ की कापियां खरीद पर भी उपलब्ध नहीं हैं।

डॉ. अम्बेडकर : मेरे पास कितनी ही प्रतियां हैं।

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श्री भट्ट : आपके पास कापियां हैं, तो दे दीजिये। लाइब्रेरी में तो वह नहीं है। लायब्रेरी में संस्कार कौस्तुभ और याज्ञवल्क्य नहीं मिलीं। आपके पास तो सब हैं, आपने खुद खरीदी हैं, आप तो बहुत विद्या पिपासु हैं, विद्यानुरागी हैं, बड़े पंडित हैं। लेकिन कृपा करके इनको थोड़े दिनों के लिये यहां लायब्रेरी में जमा कर दें ताकि हम लोग भी उनका लाभ उठा सकें और जरूरी ज्ञान प्राप्त कर सकें। ईट्स ने गीतांजलि