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में जाता तो इसकी अपेक्षा वहां पर मुझे बढि़या मसाला मिल सकता था। दुर्भाग्य से, वहां जाने का मौका ही नहीं मिला। कभी प्रेस बिल और कभी यह हिंदू संहिता विधेयक आने की वजह से सारा समय यहीं रहना पड़ता है। खै़र, मैं इस समय इस गहराई में नहीं जाता कि यह हिंदू शब्द कहां से निकला और इसका मूल स्रोत क्या है। लेकिन एक बात जो ध्यान में रखनी चाहिए वह यह है कि हिंदू शब्द के मायने हैं हिन्द भूमि के वासी अर्थात् पूरा भारतवर्ष इस देश में रहने वाले जितने लोग हैं, वह सब हिंदू हैं चाहे उनको आप आर्य नाम दीजिये फिर दस्यु कहिये। हिन्दुस्तान के जो रहने वाले थे, उनमें दो वर्ग थे, एक आर्य लोगों का और दूसरे दस्यु लोगों का, तो वे दोनों ही हिंदू थे। मैं जानना चाहता हूँ कि इस विधेयक को, जिसे पारित कर हम कानून बनाने जा रहे हैं, उसमें हिंदू के मानें क्या समझें? जिसका खुलासा कुंजरू साहब ने किया, और जैसा कि रिपोर्ट में है इसके मुतल्लिक़ कितने लोगों से मिलना हुआ, कितने लोगों की राय उसमें शामिल की गई? लेकिन मैं वे सब बातें नहीं लेना चाहता हूँ। डॉ. भगवान दास ने विवाह वैधता कानून एक्ट पर भाषण देते हुए एक जगह बताया है कि हम हिंदू किसे मानते हैं। हिंदू महज़ कौम नहीं है। जब इसी सदन में 1937 में शरीयत कानून लाया गया था। तब उनके सूफ़ी मित्र ने विधेयक पेश करते समय बताया था कि मुसलमान कौन है। उन्होंने कहा था :
‘‘इस्लाम में सैंकड़ो मत है लेकिन मोहम्मद साहब में ईमान सबके लिए ज़रूरी है, हालांकि मुझे यह भी बताया गया है कि कुछ मतावलम्बी कलेमा-ए-ईमान के दूसरे हिस्से को इतना अधिक ज़रूरी और लाज़मी नहीं मानते। वे मुहम्मद साहब को खुदा द्वारा दुनिया में इंसानियत की मदद के लिए भेजे गये दूसरे पैगम्बरों की भाँति ही मानते हैं।’’
इस का उत्तर देते हुए और इस मत का खंडन करते हुए सर यामीन खान (आगरा डिवीजन) ने कहा :
‘‘कोई भी मुसलमान ऐसा नहीं मानता। प्रत्येक मुसलमान के लिए ज़रूरी है कि वह कलेमा के दोनों भागों- ‘ला इलाह इलल्लाह’ और ‘मोहम्मद रसूलल्लाह’ में विश्वास रखता हो।’’
इस पर डॉ. भगवान दास ने टिप्पणी की ‘‘मैंने एक सूफी संत से सुना है।’’ इसके जवाब में सर यामीन खान ने कहा ‘‘जो दूसरे हिस्से पर यकीन नहीं करते वे मुसलमान नहीं हैं।’’
मैं इस बात पर कहना चाहता हूँ और अपने संशोधन में मैंने सुझाया है कि ऐसे लोग जिन्होंने हिंदू धर्म छोड़ दिया है और किसी और धर्म को अपना लिया है, लेकिन