298 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
वे अब भी हिंदू रीति-रिवाज मानते हैं, और चाहते हैं कि यह हिंदू संहिता उन पर भी लागू हो, तो उनके लिये ऐसी गुंजाइश क्यों नहीं रखी जाती है? हिंदू जब इस क़ानून का लाभ उठाना चाहते हैं तो ऐसे दूसरे लोग जो इसका लाभ उठाना चाहें, उनको क्यों नहीं लाभ उठाने देते हैं? आखिर आपको इसमें क्या एतराज है? इसी तरह ईसाई हैं जिन्होंने अपना धर्म तो बदल लिया है, लेकिन रीति-रिवाज सारे हिंदुओं के अपनाये हुये हैं, तो उनको आप इस कानून से अलग क्यों रखते हैं और उन्हें भी हिंदुओं की तरह इसका लाभ क्यों नहीं उठाने देते हैं?
इसलिए मैं डॉक्टर साहब से यह अजऱ् करना चाहता हूँ कि आप इन बातों को ध्यान में रखें? क्या मैं पढ़कर सुनाऊं कि कौन-कौन से गैर-हिंदू हैं जो इससे लाभ उठा सकते हैं? मैं लम्बी-चौड़ी बात नहीं करता हूँ लेकिन उनका ध्यान इस ओर दिलाना चाहता हूँ। आप डाक्टर गौड़ और श्री गुप्ता को ले लीजिये जो हिंदू कानूनों पर अथॉरिटी हैं, उन्होंने बताया है कि गैर-हिंदू में से किन-किन पर यह लागू होगा। कच्छी मैमन के बारे में....
श्री श्यामनंदन सहाय : आप जानते हैं, वह भी जानते हैं, लेकिन हम लोग तो नहीं जानते हैं, हमें सुनाइये।
डॉ. अम्बेडकर : संक्षिप्त न सुनाइये, पढ़ कर सुनाइये।
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श्री भट्ट : कच्छी मैमन ऐक्ट जो बना है....
डॉ. अम्बेडकर : वक्त की परवाह मत कीजिये, पढ़ कर सुनाइये।
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श्री भट्ट : मैं पढ़ कर सुना रहा हूँ। कच्छी मैमन्स ऐक्ट में यह लिखा है : ‘‘क्योंकि यह उचित समझा गया कि उन कच्छी मैमनों को जो उत्तराधिकार तथा देयता आदि के मामलों में मुस्लिम विधि से प्रशासित होना चाहते हैं या अधिनियमिति किया गया।’’
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‘‘कोई भी कच्छी मैमन जो बालिग हो तथा ब्रिटिश भारत का निवासी हो निश्चित पत्रक पर, जो निर्देशित प्राधिकारी को प्रस्ताव किया जायेगा, घोषित करेगा कि वह इस अधिनियम का लाभ उठाना चाहता है, तत्पश्चात् घोषणाकर्ता उसके नाबालिग बच्चे तथा वंशज उत्तराधिकार तथा देयता के समस्त मामलों में मुस्लिम विधि से प्रशासित होंगे।’’
श्री श्यामनंदन सहाय : यह एक ऐच्छिक धारा है। इसलिए इस मामले में यह एक ऩजीर मिशाल है।