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था। जब उस पर 1929 में बहस हुई जब भी उन्होंने विरोध किया लेकिन उनके विरोध के बावजूद यह उचित समझा गया कि इसे सारे देश में लागू किया जाये। कानून सभी के लिये उपयोगी था। मिस्टर जिन्ना को छोड़कर सभी मुसलमान सदस्यों ने उस कानून को लागू करने का विरोध किया और कहा कि हमारे उलेमा इसका विरोध कर रहे हैं इसलिये हमारे ऊपर यह लागू नहीं किया जाये। और अगर मैं भूलता नहीं हूँ तो कोई मिस्टर चटर्जी थे जो क्रिश्चियन थे। उन्होंने भी कहा था कि यह कानून हमारे धर्म के खिलाफ है इसलिये हमारे ऊपर इसे न थोपा जाए। इस प्रकार के विरोधी भाषण हुये। लेकिन क्योंकि यह एक अच्छा कानून था और सरकार उसे सब पर लागू करना चाहती थी तो सरकार ने वह सब पर लागू किया। मैं कहता हूँ कि अगर यह एक पत्नी की बात अच्छी चीज़ है तो आप उसे सब पर लागू क्यों नहीं करते उससे किसी को छोड़ते क्यों हैं? हो सकता है कि कुछ मुसलमान दो पत्नियां रखते हों। हिंदुओं में तो दो पत्नियां बहुत कम लोग रखते हैं, पर वह अपने काम-काज के लिये रखते हैं। सच कहा जाये तो अधिकतर हिंदू न तो दो पत्नियां रखते हैं और न रख सकते हैं। एक का मिलना ही मुश्किल होता है, दो कहां से लायेगा। उस समय प्रवर समिति की रिपोर्ट में कहा गया थाः
‘‘विधानमंडल में पेश किये गये विधेयक का उद्देश्य बाल-विवाहों और उनके तौर-तरीकों पर रोक लगाना था। यदि इसे और स्पष्ट किया जाये तो एक निश्चित आयु से कम उम्र के लड़के-लड़कियों की शादी को अवैध करार देना था।’’
मैं आपका ध्यान इस बात की ओर दिलाना चाहता हूँ कि पहले शारदा ऐक्ट का उद्देश्य विवाह को अवैध करार देने का था। पर बाद में उसे बदल दिया गया और वह बदल क्यों दिया गया? वह इसलिये क्योंकि तब यह समाज के लिये बहुत कड़ी चीज हो जाती। आप इस बात को ध्यान में रखें। जब मैं इस विषय पर आऊंगा तब मैं (एक पत्नीत्व) पर भी बोलूँगा। विधेयक में फेर-बदल करके उसमें यह कहा गया है कि :
‘‘सरकार के आदेशानुसार विधेयक की प्रतियां परिचालित की गयीं और इससे लोगों की इस प्रबल भावना का पता चला कि विवाह सम्पन्न होने के बाद उसकी वैधता के बारे में नुक़्ताचीनी करना, धार्मिक और वैधानिक दोनों ही रूपों में आपत्तिजनक है।’’
मेरी राय में ये आपत्तियां आज की तारीख में दुर्गम हैं और हमने तदनुसार व्यापक रूप से दिये गये उस सुझाव पर कार्यवाही की है जिसमें कहा गया है कि विधेयक का उद्देश्य बाल-विवाहों में शामिल व्यक्तियों को दण्ड देना होना चाहिए।
आप देख रहे होंगे कि इसमें कितना फ़र्क आ गया है जिन चीजों को पहले रद्द करने का विचार था, वो रद्द नहीं की गयीं, वो शादियां अवैध घोषित नहीं की