हिंदू संहिता जारी.... खंड : 2 (संहिता की प्रयोज्यता) : जारी - Page 320

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सब पर लागू करेंगे तो आपको मालूम होगा कि दूसरी क्या-क्या चीजें इसमें आती हैं और आपको क्या-क्या सुधार करने हैं। (व्यवधान) इसलिये मैं यह कहता हूँ कि आप जरा उन की तरफ भी देखिये तब आपको मालूम होगा कि जूता कहां चुभता है। तब आपको मालूम होगा कि यहां तो बड़ा विरोध है। जब कई बहनें आकर कहेंगी तब आपको हकीकत पता चलेगी। कई दूसरे लोग आयेंगे तब आपको पता चलेगा कि कितना विरोध है। लेकिन मैं कहता हूँ कि आप किसी के विरोध की परवाह मत कीजियेगा। ज़रा ठहर जाइये और फिर जैसे शारदा ऐक्ट में सरकार ने किसी की परवाह नहीं की वैसे ही कुछ दिनों बाद ऐसा कानून पास कीजिये जो सब पर लागू हो जाये। इसमें बहुत दिन की बात नहीं है। आप चाहें तो नये कानून का प्रारूप तैयार कर लें और जब हम फरवरी में मिलें तब आप उसे सदन में रखिये।

श्री श्यामनंदन सहाय : फागुन का महिना रहेगा, मेरे ख्याल में वक्त मौजूं होगा।

श्री भट्ट : हां, यह बात भी है, फागुन का महीना रहेगा। तो जो भी महीना हो मैं बड़े अदब के साथ यह सुझाव आपके सामने रखता हूँ। मैं कोई हंसी उड़ाने या ठट्ठा करने के लिये यह बात नहीं कह रहा हूँ। इससे सारे हिन्दुस्तान को फ़ायदा पहुंचेगा। गिने-चुने जो हिंदू हैं उन्हीं को आप फ़ायदा क्यों पहुंचाते हैं, आप सब को फ़ायदा पहुंचाइये। आप अपना निमंत्रण सभी को भेजिये और इसे एक उत्कृष्ट कानून बनाइये।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं डॉ. साहब से अर्ज करता हूँ कि यह जो सुझाव मैंने दिये हैं उन पर विचार करें। अंत में, मैं आप से प्रार्थना करूंगा कि आज यह ऐसा समय नहीं है कि आप इस तरह का कानून बनायें। आप रुक जाइये, रुक जाने से देश का कोई नुकसान होने वाला नहीं है, बल्कि इससे भारत सरकार की जय-जयकार होगी। मैंने समय थोड़ा सा ज्यादा लिया लेकिन बात बढ़ाने की कोशिश नहीं की है। डॉक्टर साहब से जो सरकार के यहां पर प्रतिनिधि हैं, प्रार्थना करूंगा कि हम लोगों की जो यह बिना लाग-लपेट की एक छोटी-सी बात है उस पर ध्यान दें। ताकि हमारी सरकार की जय-जयकार होती रहे।

* सरदार बी. एस. मान : उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मुझे मेरी बात कहने का मौका दिया।

मैंने एक संशोधन प्रस्तुत किया है कि सिखों को इस विधेयक की सीमा से (315 पीएसडी) से मुक्त कर दिया जाये। वास्तव में, मुझे कोई ऐसा संशोधन पेश करते

* संसदीय वाद-विवाद, खंड- XV, भाग- II, 18 सितंबर, 1951 पृष्ठ 2835-40