306 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
हुए खुशी होती जिसमें केवल सिख, हिंदू या मुसलमान संप्रदाय की ही बात न होती, लेकिन इस विधेयक की एक प्रमुख धारा की रचना जिस ढंग से की गयी है, उसके कारण मुझे ‘सिख’ के बजाय किसी क्षेत्रीय को या फिर एक विशेष वर्ग के कृषकों को मुक्त रखा जाये। लेकिन, चूँकि विधेयक के प्रारूपकारों ने स्वयं हिंदू, जैन, बौद्ध और सिख शब्दों का इस्तेमाल किया है, इसलिए मैंने अपने संशोधन में ‘सिखों’ की बात की है। वास्तव में मेरा संशोधन खंड-1 के सम्बन्ध में है कि विधेयक को पंजाब तथा (पेप्सू) राज्य में लागू न किया जाये। मेरे इस तर्क का आधार कोई संकीर्ण सांप्रदायिक या धार्मिक भावना नहीं है। मैं बाद में इस विषय पर भी आऊंगा। लेकिन मैं इस तथ्य को नज़रअंदाज नहीं कर सकता कि सिखों के हिंदू विधि के अंतर्गत लाने से एक तरह की गलत राजनीतिक-सांप्रदायिक प्रवृत्ति का आभास होगा।
कल, विद्वान डॉक्टर साहब ने एक मामले का उदाहरण यह दिखलाने के लिए दिया था कि सिख अब तक हिंदू विधि से प्रशासित होते आये हैं। उनसे क्षमा प्रार्थना करते हुए मैं बतला दूँ कि उन्होंने जिस कानून का उदाहरण दिया है वह अकृषक सम्पत्ति तक ही सीमित था। अधिकतर सिख कृषक हैं जो कुल सिखों का 95 प्रतिशत है। सिख किस कानून से प्रशासित होते आये हैं, इस बात का ठीक-ठीक पता लगाने के लिए केवल व्यवसायी सिखों, जिनमें खत्री और शहरों में रहने वाले अन्य सिख शामिल हैं, को ही नहीं देखना है; अपितु उन बहुसंख्यक कृषक सिखों की ओर भी ध्यान देना है और यह देखना है कि वे किन कानूनों से प्रशासित होते आये हैं? और मैं ऐसे एक नहीं हजारों मामलों के उदाहरण दे सकता हूँ। मैं यह साबित करने के लिए कि पंजाब में कृषि कार्य से संबंद्ध अन्य वर्गों के साथ-साथ कृषक सिख लोक व्यवहार के कानूनों से प्रशासित होते आये हैं, कितने ही मामले गिना दूँगा; और लोक व्यवहार के ये कानून हिंदू संहिता में प्रस्तावित कानूनों से कहीं अधिक प्रगतिशील हैं। इसलिए मेरा कहना है कि सिख पूरी तरह से सेकुलर लॉ द्वारा प्रशासित होते आये हैं। हमारी जनसंख्या का एक बड़ा भाग जो कृषि से संबद्ध है, उसके लिए पंजाब और (पेप्सू) सब जगह एक जैसा कानन है। इसलिए हमें उस कानून को नहीं देखना है जो वहां के चंद लोगों पर लागू होता है, हमें उस कानून को देखना है जो वहां की समस्त जनता पर, वहां की 95 प्रतिशत आबादी पर लागू होता है। जैसा कि मैंने कहा, वहां के कानून बहुत ही प्रगतिशील हैं, चाहे हिंदू हों, मुसलमान हों, या सिख हों, उत्तराधिकार के मामलों में सब पर एक जैसा कानून लागू होता है और वह है प्रथागत कानून। लेकिन यह जो हिंदू संहिता आप ला रहे हैं मैं इसकी मुखालफ़त करता हूँ। मेरे पंजाब में बगैर किसी जाति प्रांति और सांप्रदायिक भेदभाव के पहले से ही एक जैसा और समान कानून है। लेकिन इस तरह का कानन लाकर पहली बार पंजाब में सांप्रदायिकता के बीज बोये जाने की कोशिश हो रही है। (व्यवधान)