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हां, वहां के रिवाज़ ऐसे ही हैं और रिवाज़ लम्बे समय से चले आ रहे हैं उन प्रथाओं पर आधारित हैं जिन्हें समाज ने बाक़ायदा मान्यता दी है। इन रिवाज़ों को कुचलने के कई प्रयास हुए हैं; लेकिन यह सब गलत हैं और ऐसी कोई भी नीति निश्चित तौर पर अहितकारी और अदूरदर्शी होगी जिसमें जनता की भावनाओं की कद्र किये बिना कानूनों को थोपा जाये और फिर यह अपेक्षा की जाये कि 15 दिनों के भीतर पूरा समाज बदल जायेगा। एक ऐसा समाज जो सदियों से चला आ रहा है और जिसके प्राणों में युगों-युगों का ज्ञान और विभिन्न युगों की चेतना समाहित है। मैं ऐसा इसलिए नहीं कह रहा हूँ क्योंकि इस कानून के मसौदे को एक अतिविशिष्ट वृद्ध ब्राह्मण ने हमारे सामने रखा है इसलिए इसको हाथ लगाना या इसमें संशोधन करना पाप है। मेरे तर्क का कारण उस तरह की कोई पुण्यशीलता नहीं है। मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूँ कि ये रिवाज़ सदियों से चले आ रहे हैं और इनमें समय बीतने के साथ-साथ संवर्द्धन भी होता रहा है। किसी तरह का कड़ापन न होने के कारण इन रिवाज़ों में कुछ व्यावहारिक रस्में भी शामिल होती गयीं और ये रस्में वहां के लोगों के लिए बड़ी उपयोगी हैं। मैं इस विषय पर बाद में आऊंगा। यहां पर मैं केवल प्रसंगवश यह कहना चाहता हूँ कि पंजाब में रिवाज़ लिखित कानूनों से अधिक मान्य हैं। वहां पहले भी रिवाज ही कानून थे और आज भी रिवाज़ ही कानून हैं।
इसके अलावा, मैं यह भी साबित कर दूँगा कि हमारे जो रिवाज हैं वे इस कानून से जो संसद में लाया गया है और जो हमें उलटी दिशा में ले जाता है, उससे कहीं अधिक प्रगतिशील हैं। वे इससे कई मामलों में अच्छे हैं।
मैं इसलिए यह कहता हूँ कि सिखों को इस कानून से मुक्त रखा जाये। माननीय सदस्यों को अचम्भा होगा, जैसा मुझे हुआ है, कि इस सदन में जब से श्री मंडल द्वारा यह हिंदू संहिता विधेयक पुरःस्थापित किया गया है-हालांकि डॉक्टर अम्बेडकर उसमें सुधार लाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन कुल मिलाकर वह मंडल का ही राग अलाप रहे हैं- तब से लेकर अब तक प्रवर समिति में एक भी सिख सदस्य नहीं रखा गया।
डॉ. अम्बेडकर : ज्ञानी गुरमुख सिंह थे?
सरदार बी. एस. मान : नहीं। इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर सिखों की राय बिल्कुल
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नहीं ली गयी। मैं मानता हूँ कि सिखों में इस बात को लेकर आंदोलन नहीं हुआ लेकिन इसकी वजह कुछ और थी। सिखों को बताया गया था कि ज़मीनजायदाद को हिंदू संहिता विधेयक से अलहदा रखा गया है। यही कारण था कि सिखों ने इस विधेयक में दिलचस्पी नहीं ली। 95 प्रतिशत सिख यही सोचते रहे कि हिंदू संहिता विधेयक का उन पर कोई बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ेगा।