हिंदू संहिता जारी.... खंड : 2 (संहिता की प्रयोज्यता) : जारी - Page 324

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सदस्य से परामर्श किया गया और न ही उसे समिति में शामिल किया गया। डॉ. अम्बेडकर कहते हैं कि ज्ञानी गुरमुख सिंह मुसाफिर समिति में शामिल थे। यदि वे वहां थे, तो क्या आप ने उनकी बात मानी। यदि प्रवर समिति ने सिख समुदाय का एक ही सदस्य होता, तो क्या आप उसकी राय को वाजिब महत्व देते? तब सरदार गुरमुख सिंह प्रवर समिति के सदस्य नहीं थे लेकिन जब सभा को स्थगित किया गया और बाद में डॉ. अम्बेडकर कुछ और पंडितों से विचार-विमर्श करने को राजी हो गये और उन्होंने एक तरह की अनौपचारिक बैठकें की तब सरदार गुरमुख सिंह मुसाफिर से अपनी राय देने को कहा गया। डॉ. अम्बेडकर कहते हैं कि उन्होंने सरदार गुरमुख सिंह मुसाफिर से सिखों की राय के बारे में विचार-विमर्श किया था, यदि ऐसा था तो आप उनकी सलाह मानिये? आप उस बात को मानिये जो उन्होंने सिख समुदाय के संबंध में कही। लेकिन सरकार ने सिख सदस्यों को प्रवर समिति में लेना वाजि़ब नहीं समझा और सच पूछा जाये तो हम सिखों ने कभी आंदोलन इसलिए नहीं किया क्योंकि आज तक हमें यही विश्वास दिलाया गया कि इसमें जमीन-जायदाद को शामिल नहीं किया जायेगा, जमीन-जायदाद को इससे अलग रखा जायेगा। लेकिन यकायक जब इस विधेयक को पुनःस्थापित किया गया तो हमने देखा कि उन्होंने अपने मन से ज़मीन-जायदाद को भी इस विधेयक के दायरे में ले लिया है। शुरू में हम लोगों ने इसमें इसलिए दिलचस्पी नहीं ली क्योंकि जब ज़मीन-जायदाद को इससे अलग रखने की बात की और हम समझते थे कि इस विधेयक से हमारा कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन अब अचानक यह विधेयक आ टपका है - यह पूरी तरह से घालमेल है, कई मामलों में यह दकियानूसी है और कुछ मामलों में बहुत आगे हैं, सब उल्टी-सीधी बातें हैं इसमें और अब इसे हमारे मुंह पर पटका जा रहा है कि इसे मान लो मैं मानता हूँ जब मैं ही इस विधेयक को नहीं समझ पाया तो गांव के अनपढ़ और किसान क्या समझ पायें होंगे? अनपढ़ और

खेतिहर लोग तो बिल्कुल ही नहीं समझ पायें होंगे क्योंकि उन्हें समझाया गया था कि ‘‘चिंता करने की कोई बात नहीं। इससे आप लोगों पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।’’ मेरी शिकायत यह है कि सिखों की राय भली-भांति नहीं ली गयी। और यदि आप हिंदू बहुमत द्वारा इसे यहां पारित कर देते हैं तो सिखों के दिलों में यह बात बहुत चुभेगी कि उनके एकमत होकर विरोध करने के बावजूद, उनको यह विश्वास दिलाये जाने के बावजूद कि विधेयक की अधिकतर बातें उन पर लागू नहीं होंगी, सत्र के अंतिम समय में इसे सिखों की सहमति के बिना पारित कर दिया गया।

एक माननीय सदस्य : तो आपके दूसरे सिख सदस्य विरोध क्यों नहीं करते।

सरदार बी. एस. मान : हाँ विरोध किया है। हमारे माननीय मित्र, सरदार हुकम सिंह जो सिखों की ओर से हमसे भी बेहतर ढंग से बोल सकते हैं। उन्होंने विरोध किया है।