310 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कुछ भी हो, यह कोई राजनीतिक मामला तो है नहीं कि आप उनकी सलाह न मानें। यह कोई ऐसा मामला तो है नहीं कि वो विरोधी खेमे में हैं इसलिए उनकी राय कोई मायने नहीं रखती। वैयक्तिक कानूनों के मामलों पर, धार्मिक विषयों के मामलों पर, हिंदू कानून को अंगीकार किये जाने के मामलों पर आपको जन-प्रतिनिधियों की राय मानी चाहिए और हम सभी सदस्य एकमत से इसका विरोध कर रहे हैं। और यदि आप हमारे विरोध के बावजूद इस विधेयक को पारित कर इसे हम पर लागू करते हैं, तो यह एक अनोखी बात होगी-लोग इसे अपनी मनमानी समझेंगे, इससे साम्प्रदायिकता की बू आयेगी। संयोग है कि यहां पर हम केवल सात सिख सदस्य ही है। लेकिन हम चाहते हैं कि धार्मिक मामलों तथा वैयक्तिक कानूनों के मामलों पर किसी वर्ग के प्रतिनिधियों की संख्या को महत्व दिया जाना चाहिए। कुछ लोगों ने आपके पहले ही रियायतें देखी हैं। मैं सिखों का मामला इसलिए नहीं उठा रहा हूँ क्योंकि औरों को रियायतें दी गयी हैं। मुसलमान को चार शादियां करने की छूट दी गयी है, इसलिए हमें भी छूट दी जाये, मैं यह नहीं कहता। लेकिन सौ टके की बात यह है कि आपने रियायतें दी हैं। क्यों? इसलिए कि वैयक्तिक कानूनों के मामले में मुसलमानों और ईसाइयों के कानून, हिंदू से अलग हैं और क्योंकि उनके कानून अलग हैं और कई मामलों में वे हिंदू कानून के विपरीत हैं, इसलिए आपने उन्हें रियायतें दें ताकि उन्हें यह लगे कि हिंदू कानून उन पर थोप दिये गये हैं? यदि आपने यह समझकर छूट दी है तब तो आपने इस सिद्धान्त को स्वीकार कर लिया है कि हिंदुओं का बहुमत होने पर भी जहां तक उनके व्यक्तिगत रिवाज़ों और धार्मिक प्रथाओं का सम्बन्ध है, वे उन्हें अल्पमत वालों के गले नहीं मढ़ेंगे। यदि आपने इसे इसलिए स्वीकार किया है कि मुस्लिम कानून, ईसाई कानून और यहां तक कि पारसी कानून हिंदू कानूनों से मूलतः भिन्न हैं तो मुझे भी यहां सदन में यह सिद्ध करने की अनुमति दी जाये कि किसी भी विषय जिस पर आप यहां कानून बनाना चाहते हैं : जैसे शादी, तलाक, उत्तराधिकार-सिख कानून उनसे बिल्कुल अलग हैं। और इस आधार पर मैं भी मांग करता हूँ कि हमें भी रियायतें दी जायें, जैसे मुसलमानों को दी गयी हैं। क्योंकि मुसलमानों ने यह साबित कर दिया था उनके कानून अलग हैं और आपने मान लिया। तो यदि मैं भी साबित कर दूँ कि हरेक चीज जिस पर आप यहां कानून बना रहे हैं, वह सिखों के कानून से पूरी तरह अलग हैं, तो फिर मुझे भी वैसे ही रियायतें दी जायें जैसी कि आपने मुसलमानों, पारसियों और ईसाइयों को दी हैं।
माननीय उपाध्यक्ष : माननीय सदस्य अपना भाषण कल जारी रख सकते हैं।
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इसके पश्चात् सभा की बैठक बुधवार, 19 सितम्बर, 1951 के साढ़े आठ बजे तक के लिए स्थगित कर दी गयी।