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श्री त्यागी (वित्त राज्यमंत्री) : असहमति प्रकट की है।
सरदार बी. एस. मान : मुझे खेद है कि मैंने श्री त्यागी का नाम लिया, क्योंकि इस समय वह सरकार का समर्थन कर रहे हैं- और मैं विरोध।
श्री त्यागी : मैं तो विधुर हूँ। अब विवाह और तलाक से कोई दिलचस्पी नहीं है।
श्री गोपालास्वामी (राज्य, यातायात तथा रेलमंत्री) : कौन जानता है? हो सकता
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है आगे विचार बदल जाये।
सरदार बी. एस. मान : यहां पर ऐसे बहुत से विधुर हैं जो चाहते हैं तलाक व्यवस्था बनी रहे क्योंकि उनका ‘भला’ तो इसी में होगा। एक विधुर तलाक न चाहे या एक अनोखी बात है।
सरदार सुचेत सिंह (पेप्सू) : हो सकता है वह अपने पड़ोसियों के तलाक में दिलचस्पी रखते हों।
सरदार बी. एस. मान : तो मैं कह रहा था, कि हमसे इस बारे में पूछा तक नहीं गया है। यद्यपि सिख संप्रदाय में विभिन्न विचारों के लोग है- लेकिन यह सरकार न तो कांग्रेसी सिखों की सुन रही है, न अकालियों की। न निर्दलीय सिखों की। और न ही सिख मंत्रियों की। यह अचंभे की बात है कि सरकार इस नतीजे पर कैसे पहुंच गयी कि सिखों से पर्याप्त विचार-विमर्श कर लिया गया है। कल मेरा भाषण
खत्म होते ही मेरे पास कुछ मित्र आये और मुझसे कहने लगे कि मान लिया आपसे इस विषय पर पूछा भी नहीं गया है और आपके रिवाज भी अलग हैं परन्तु क्या हम आपके लिये कानून नहीं बना सकते हैं? क्योंकि अभी तक आप भी तो हिंदू ही थे और आप भी तो हिंदू विधि द्वारा ही प्रशासित होते आये हैं। हम हिंदू विधि से प्रशासित होते आये हैं या नहीं, इस विषय पर मैं बाद में आऊंगा, लेकिन यह कि हम हिंदू हैं या नहीं, इस बारे में कुछ कहना चाहता हूँ। कल एक पुस्तिका मेरे हाथ लगी थी, जिसमें यह लिखा था कि यदि आप पंजाब के किसी ग्रामीण सिख को जाकर हिंदू कह दें तो वह उसका उत्तर जबान से नहीं थप्पड़ से देगा? इसलिये मैं वे सब बातें यहां नहीं कहना चाहता।
पंडित ठाकुर दास भार्गव (पंजाब) : पंजाब के सिख किसान, हिंदू किसानों से अलग कैसे हैं?
सरदार बी. एस. मान : मैं अपने तर्क को इसी बात पर रख रहा हूँ कि किसान होने के नाते हम हिंदू तथा मुसलमान किसानों के समान हैं और मेरे माननीय मित्र को पता है कि सिख कृषक भी हिंदू तथा मुसलमान किसानों की भांति अपने कुछ