314 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
पारंपरिक कानूनों को मानते हैं जो सब पर एक समान लागू होते हैं। यदि मैं सिख शब्द का प्रयोग कर रहा हूँ तो इसका कारण यह विधेयक है, मैं कहना चाहता था कि पंजाब के किसानों को इस विधेयक की परिधि से बाहर रखा जाये, लेकिन मैं क्या करूं जब सरकार ही हिंदुओं, सिखों, जैनियों आदि के बारे में विधेयक लाती है, कानून बनाती है और धर्म निरपेक्षता के बजाय सांप्रदायिक समूहों की बातें करती है।
पंडित ठाकुर दास भार्गव : क्या यह सच नहीं है कि गांव में रहने वाले गैर-किसान हिंदू भी किसान हिंदुओं के रिवाज़ों का अनुपालन करते हैं।
सरदार बी. एस. मान : जी हाँ, हमारे रिवाजों की यही तो खूबी है। दूसरी जगहों की विपरीत पंजाब में यही अच्छाई है कि वहां के लोग धार्मिक कानूनों के बजाय गांव के रीति-रिवाजों के मुताबिक चलते हैं। हम लोग खेती पर निर्भर हैं और इसलिए हम उस स्थान के लोक व्यवहार के कानून मानते हैं ये लोग जो व्यवधान डाल रहे हैं, मैं इसका जवाब ‘रैट्टी डाइजेस्ट’ के एक उदाहरण से देना चाहता हूँ। मेरे कहने का मतलब सिर्फ यह है कि जहां तक इस कानून को पंजाब में लागू किये जाने का सवाल है; वह वहां के प्रगतिशील समाज के लिए कतई ठीक नहीं है क्योंकि यह बहुत ही रूढ़ और कट्टरपंथी है और धर्म विशेष से जुड़े होने के कारण हमको आगे के बजाय पीछे ले जायेगा- हमारे पंजाबी रीति-रिवाज जहां तक सांप्रदायिकता का सवाल है उससे बहुत ऊपर हैं। गांवों में हम सब एक ही जैसे रीति-रिवाजों, एक ही जैसे कानून अपनाते आये हैं। क्या हिंदू, क्या मुसलमान, क्या सिख, क्या किसान, क्या गैर-किसान, सब के सब सैकड़ों-हजारों
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : शरीयत कानून के आगे रिवाज़ की अहमियत नहीं रही।
सरदार बी. एस. मान : जहां प्रथागत कानून नहीं हैं वहां शरीयत का आश्रय लिया जाता है। यह पूर्णतया पृथक् बात है। पंजाब विधि अधिनियम, 1872 के खंड 5 में स्पष्ट रूप से लिखा हुआ है कि पंजाब में निर्णय के लिये पहले प्रथागत-कानून का आश्रय लिया जायेगा, परन्तु जहां प्रथागत कानून न हों वहां शरीयत अथवा हिंदू विधि का आश्रय लिया जायेगा।
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सरदार बी. एस. मान : केवल लिखित नहीं है ये संकलित भी हैं। और उन पर ध्यान से विचार भी हुआ है और वह आज से नहीं शताब्दियों से हैं।
एक माननीय सदस्य : क्या आपके रिवाज़ हिंदू रिवाज़ों के समान नहीं हैं?