318 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सिखों आदि पर प्रभावी न होगा? यदि हम खंड-2 के विवाह तथा विवाह विच्छेद सम्बन्धी विषयों पर कुछ संशोधनों के साथ सहमत हो कर विधेयक पर आगे विचार करें-तो फिर भी हम अन्य अध्यायों में संशोधन कर सकते हैं।
माननीय उपाध्यक्ष : मैं असंमजस में पड़ गया हूँ। मैंने सोचा था, कि माननीय प्रधानमंत्री के कहने के पश्चात्, कि हम केवल विवाह तथा विवाह विच्छेद पर ही विचार करेंगे, मैं सदस्यों से चर्चा समाप्त करने को कह सकूँगा। परन्तु यदि खंड-2 इनसे इतर अन्य सभी अध्यायों पर भी लागू होना है तो मैं माननीय सदस्यों को उसका उल्लेख न करने से रोक नहीं सकता हूँ। मैं माननीय विधि मंत्री से कहूँगा कि वह इसका स्पष्टीकरण करें, अन्यथा इसका विषम क्षेत्र बढ़ जायेगा और फिर इतनी जल्दी वाद-विवाद समाप्त करना भी युक्ति-युक्त नहीं होगा।
डॉ. अम्बेडकर : माननीय प्रधानमंत्री ने उस दिन कहा था कि सदन 6 तारीख को स्थगित हो जायेगा।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : यह तो केवल तात्कालिक व्यवस्था है।
माननीय डॉ. अम्बेडकर : कैसी भी हो लेकिन व्यवस्था तो है। मेरे विचार से इस
| csM | dj |
|---|
सत्र में विवाह तथा विवाह विच्छेद से सम्बन्ध रखने वाले अध्याय के अतिरिक्त अन्य अध्यायों पर विचार नहीं हो सकेगा। जब हम इस अध्याय के अन्त तक पहुंचेंगे तो मैं कुछ संशोधन रखूँगा, जिनसे वह भाग स्वतंत्र हो जायेगा। मैं कुछ अनुसूचियां भी लगाना चाहता हूँ जो विवाह तथा विवाह-विच्छेद के साथ-साथ जायेंगी। मेरे विचार से सदन को भली प्रकार से जान लेना चाहिये, कि वर्तमान सत्र में केवल इतना ही हो सकेगा। फिर जब दूसरे अध्याय सदन के सम्मुख रखें जायेंगे, तो निस्संदेह उस समय के विधि मंत्री तथा प्रारूपकार यह देखेंगे कि वह अध्याय भी स्वतंत्र रहें तथा उन परिभाषाओं तथा नियमों को दोहराना पड़ेगा, जब वह अध्याय सभा के सम्मुख रखें जायेंगे। जब तक परिभाषा तथा लागू होने के नियम उन अध्यायों में दोबारा नहीं लिखे जाते, तब तक कभी भी वह उन पर लागू नहीं किये जा सकते हैं। मेरे विचार में विधि वेत्ता सदस्य इस बात को समझ रहे होंगे, अर्थात् जब भी अन्य अध्याय सदन के सामने आयेंगे, तो उस समय माननीय सदस्यों को स्वतंत्रता होगी, कि वह यह देखें, कि क्या इस विधेयक के क्षेत्रों तथा सम्प्रदायों पर लागू होने के विषय में समस्त नियम तथा परिभाषायें यही हैं जो इस अध्याय के सम्बन्ध में पारित की जायेंगी। भारत सरकार तथा सदन को स्वतंत्रता है कि चाहे वे उन नियमों को सारे भारत वर्ष पर लागू कर दे, सारे सम्प्रदायों पर लागू कर दें, अथवा किसी को विशेष रूप से मुक्त कर दें। यह एक ऐसा विषय है, जिसे मेरे विचार में, भविष्य की