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ही विधेयक होगा। अन्य विषयों के लिये अन्य स्वतंत्र विधेयक होंगे तो फिर संहिता का प्रश्न ही नहीं उठता है। वह स्वतंत्र विधेयक होंगे और यदि आवश्यक हुआ तो उनके एकीकरण का कार्य बाद में किया जायेगा। इसलिए इस विधेयक को हम इसी रूप में पारित नहीं कर रहे हैं। हम केवल इसके विभिन्न शीर्षों को पारित कर रहे हैं और इस ताह केवल यही तीन बातें हमारे सामने हैं।
श्री रामलिंगम चैट्टियर (मद्रास) : कई प्रान्तों में एक पत्नीत्व तथा विवाह विच्छेद सम्बन्धी विधियां हैं। यदि केन्द्र में भी संहिता के सिद्धान्त को छोड़कर केवल इन्हीं दो विषयों पर विधि बनाने का प्रश्न है तो उससे क्या लाभ है। क्यों न ऐसे साधारण विषयों को राज्य सरकारों को छोड़ दिया जाये? यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न है जिस पर ध्यान दिया जाये।
पंडित मालवीय (उत्तर प्रदेश) : क्या माननीय विधि मंत्री के लिये यह उपयुक्त न होगा कि बाद में करने की अपेक्षा वह इस कार्य को इसी समय करें।
माननीय डॉ. अम्बेडकर : सरकार के उद्देश्यों पर सन्देह करने का कोई कारण नहीं होना चाहिये जो कुछ हमने कहा है हम उसी पर स्थिर रहेंगे।
पंडित मालवीय : मुझे आश्चर्य है कि माननीय मंत्री ने ऐसा समझा है। मैं तो केवल यही कह रहा था कि क्या ऐसा करना इस समय उपयुक्त न होगा।
माननीय डॉ. अम्बेडकर : समझ लीजिये कि ऐसा ही होगा।
पंडित मालवीय : जब तक कोई काम कर न दिया जाये, उसे किया हुआ नहीं समझना चाहिये।
माननीय उपाध्यक्ष : माननीय विधि मंत्री ने सरकार के उद्देश्य का स्पष्टीकरण कर दिया है। लेकिन मेरी मुश्किल यह है कि मैं उन्हें तुरन्त करने के लिये नहीं कह सकता क्योंकि खंड-2 के पारित होने के पश्चात् हम खंड 55 ले लें तो भी मुझे सन्देह है कि क्या उस समय हम खंड-2 में कोई सुधार कर सकेंगे।
माननीय डॉ. अम्बेडकर : जब श्रीमान् खंड-2 को रखेंगे तो मैं उक्त खंड में कुछ आनुषंगिक संशोधन करने के अधिकार को अपने पास सुरक्षित रखने का प्रस्ताव रखना चाहता हूँ।
कुछ माननीय सदस्य : नहीं, नहीं। यह कैसे हो सकता है।
माननीय डॉ. अम्बेडकर : ऐसा करना संभव है।
पंडित मालवीय : ऐसा करना अधिकारवादी संसदीय नहीं है।