हिंदू संहिता-(जारी) खंड 2, (संहिता की प्रयोज्य लागू होना) - जारी - Page 339

324 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

माननीय उपाध्यक्ष : ऐसा प्रतीत होता है कि माननीय सदस्य सदन में नहीं थे, अथवा ठीक प्रकार से सुन नहीं रहे थे।

श्री सरवटे : मैं एक स्पष्टीकरण चाहता हूँ। हमने कुछ संशोधन प्रस्तुत किये थे। वे संशोधन खंड-2 के विस्तार पर आधारित हैं। हमें उन्हें प्रस्तुत करने की आज्ञा होनी चाहिये, अथवा उन्हें तत्पश्चात् ले लिया जाये।

माननीय उपाध्यक्ष : सभी संशोधनों पर अभी विचार होगा। मैं कोई अन्य संशोधन प्रस्तुत करने की आज्ञा नहीं दे रहा हूँ। माननीय विधि मंत्री द्वारा प्रस्तुत संशोधनों के साथ ही उन पर भी विचार हो चुका है। यदि अन्य खंडों पर विचार होते समय हम खंड-2 में कोई प्रासंगिक संशोधन रखना चाहें तो वाद-विवाद केवल प्रासंगिक, सहायिका तथा आनुषंगिक संशोधनों तक ही सीमित रहेगा। आज हमें इसको समाप्त कर देना चाहिये।

श्री आर. के. चौधरी : मैं अपने संदेहों का स्पष्टीकरण चाहता हूँ। मेरे विचार में

खंड-2 केवल विवाह तथा विवाह-विच्छेद पर ही लागू होगा। मैं जानना चाहता हूँ कि जब उत्तराधिकार सम्बन्धी खंड प्रस्तुत होंगे, तो उसके साथ ऐसा भी कोई खंड होगा जिसमें लिखा हो कि यह खंड अमुक लोगों पर लागू नहीं होंगे? ये केवल उन पर लागू होंगे ऐसा चाहते हैं?

माननीय उपाध्यक्ष : इस समय तो माननीय विधि मंत्री ने केवल यह कहा है, कि यह विधेयक केवल विवाह तथा विवाह-विच्छेद के सम्बन्ध में ही लागू होगा तथा दूसरे खंडों में उपयुक्त संशोधन किये जायेंगे। दूसरे कानून मंत्री क्या कहेंगे और भविष्य में क्या होगा इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता है।

श्री आर. के. चौधरी : श्रीमान् आप इस खंड को पारित किये जाने की आज्ञा कैसे दे सकते हैं। यह विधेयक तो हमारी गर्दनों पर लटक रही तलवार के समान होगा।

माननीय उपाध्यक्ष : यथोचित संशोधनों के साथ एक और खंड प्रस्तुत किया जायेगा। माननीय सदस्य तब पूर्ण दृढ़ता से बोल सकेंगे। अब हमें समय नष्ट नहीं करना चाहिये।

श्री जे. आर. कपूर : क्या मैं निवेदन कर सकता हूं कि हमें अन्य, साधारण महत्व की चर्चा छोड़ कर सब खंड-2 के संशोधनों पर वाद-विवाद आरंभ करना चाहिये? श्रीमान् चाहते हैं कि वाद-विवाद आज एक बजे तक समाप्त कर दिया जाये। अन्यथा महत्वपूर्ण संशोधनों पर चर्चा के लिए समय नहीं मिलेगा।

माननीय उपाध्यक्ष : खंड तथा संशोधनों पर वाद-विवाद होगा। मैं किसी सदस्य को केवल इसलिये बोलने की आज्ञा नहीं दूँगा क्योंकि उसने संशोधन प्रस्तुत किया है।