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श्री भट्ट (बंबई) : मुझे यह कहना है कि आज यह खुलासा हुआ है और आपने यह बतलाया है कि आप खंड-2 पर मतदान कराएंगे तो आज तो माननीय कानून मंत्री की विचारधारा है उस पर से क्या गुंजाइश है कि हम दूसरे संशोधन पेश कर सकें। अब वह विवाह और विवाह-विच्छेद कानून अलग बनाना चाहते हैं। क्या इसमें इस तरह का संशोधन लाने की गुंजाइश है, जैसा कि मैंने पहले सुझाया था, कि इसको सारे हिन्दुस्तान के लिये बनाया जाये। और क्या आप इसकी इजाजत देंगे?
माननीय डॉ. अम्बेडकर : इस बारे में तो आप संशोधन दे चुके हैं।
श्री भट्ट : जैसा संशोधन शारदा ऐक्ट में था वैसा संशोधन मैंने नहीं दिया है।
माननीय उपाध्यक्ष : माननीय विधि मंत्री से यह पूछना कि क्या यह विधेयक देश के प्रत्येक व्यक्ति अथवा भाग पर लागू होगा, अच्छा नहीं है। संशोधन प्रस्तुत हो ही चुके हैं। उन पर सदन का मत लिया जायेगा। तथा निर्णय सदन के हाथ में है। यदि निर्णय विधि मंत्री के विरुद्ध होगा तो उसे स्वीकार करेंगे। इस प्रकार के और संशोधन अर्थात् यह विधेयक अमुक सम्प्रदाय पर अथवा अमुक क्षेत्र में लागू न किया जाये, प्रस्तुत करने का अब कोई प्रश्न उत्पन्न नहीं होना चाहिये। सभी संशोधन सदन में रखे जा चुके हैं लेकिन मैं उन पर आज मतदान नहीं कराऊंगा। उन पर बाद में मतदान कराया जायेगा। सदन चाहे तो उन्हें स्वीकार करे या अस्वीकार करे।
पंडित मैत्रा (पश्चिम बंगाल) : माननीय विधि मंत्री कहते हैं, कि वह निर्णय को सहर्ष स्वीकार नहीं करेंगे।।
माननीय डॉ. अम्बेडकर : मैंने कहा था, कि मैं इसे सहर्ष स्वीकार नहीं करूंगा।
श्री राधेलाल व्यास (मध्य भारत) : व्यवस्था के प्रश्न के सम्बन्ध में मैं पूछना चाहता हूँ कि खंड-2 पर चर्चा समाप्त हो जाने, तथा माननीय मंत्री के उत्तर के पश्चात् भी क्या कोई संशोधन प्रस्तुत करने की अनुमति होगी?
माननीय उपाध्यक्ष : माननीय सदस्य व्यर्थ ही औचित्य प्रश्न उठा रहे हैं। माननीय मंत्री किसी संशोधन को मान सकते हैं अथवा अस्वीकार कर सकते हैं। यदि संशोधन ठीक हुये, तो निश्चय ही वे सदन के सम्मुख रखे जायेंगे। आज खंड-2 पर चर्चा समाप्त हो जायेगी यदि कोई आनुषंगिक संशोधन हुये भी तो वे सदन के सामने निश्चित रूप से रखे जायेंगे।
ऐसे आनुषंगिक संशोधन या तो माननीय विधि मंत्री रखेंगे या कोई अन्य माननीय सदस्य फिर इन पर वाद-विवाद होगा और इन संशोधनों के साथ खंड-खंड पर