327
माननीय उपाध्यक्ष : ‘‘संहिता के बजाय इस विधेयक का नाम ‘‘विवाह तथा विवाह-विच्छेद अधिनियम’’ होगा। मेरा विचार है कि जब माननीय विधि मंत्री अपना भाषण समाप्त कर लें तो मैं इसे मतदान के लिये सदन के समक्ष प्रस्तुत करूंगा। श्री रामलिंगम चेट्टियर : खड़े हुए....
माननीय उपाध्यक्ष : माननीय सदस्य के प्रश्न का उत्तर दिया जा चुका है, यदि उनका यह विचार है कि राज्यों में इस से भी प्रगतिशील विधियां हैं तो वह यहां भी संशोधन प्रस्तुत कर सकते हैं। माननीय सदस्य ने कहा है कि तीन राज्यों में ऐसी विधियां बनी हुई हैं, तथा एकरूपता लाने के लिये एक केन्द्रीय विधि आवश्यक है। यह विषय राज्यों तथा केन्द्र की समवर्ती सूची का विषय है। यह ऐसा कठिन कार्य नहीं है जिसे सुलझाया न जा सके।
श्री रामलिंगम चेट्टियर : यह कठिनाई हल नहीं हो सकती है।
माननीय उपाध्यक्ष : माननीय विधि मंत्री इस विषय पर सहमत नहीं है।
श्री रामलिंगम चेट्टियर : मुझे एक संशोधन प्रस्तुत करने की आज्ञा दी जाये।
माननीय उपाध्यक्ष : माननीय सदस्य के संशोधन प्रस्तुत करने का अवसर मिला था। पता नहीं क्यों उस समय उन्होंने ऐसा नहीं किया। अब आगे हम उनके इस संशोधन के बारे में सोचेंगे। विधेयक के सभी खण्ड, उत्तराधिकार वगैरह के सदन के सामने थे और उन पर हर रोज चर्चा होती रही है। हम राज्य विधानमंडलों द्वारा पारित विधेयकों के अनुरूप उनके संशोधन आने तक की प्रतीक्षा नहीं कर सकते हैं। माननीय सदस्य की यह मांग सर्वथा अनुचित है। जहां तक खंड 2 का प्रश्न है यह किसी भी भाग में लागू हो सकता है। स्पष्टीकरण हेतु मैं यह कहना चाहता हूँ कि वाद-विवाद केवल उन्हीं विषयों पर होना चाहिये जो सदन के समक्ष रखे जायें। माननीय विधि मंत्री कह चुके हैं कि आनुषंगिक संशोधन केवल इस संहिता के नामकरण तथा परिभाषा के सम्बन्ध में होंगे। पहले इस पर वाद-विवाद होगा, फिर माननीय विधि मंत्री उत्तर देंगे और तब मतदान होगा। फिर यह जानेंगे कि कौन-सा संशोधन किस खंड पर लागू होता है इससे कोई कठिनाई नहीं रह जायेगी।
माननीय डॉ. अम्बेडकर : मैंने अीी सुना है कि श्रीमान मुझे एक बजे बोलने के लिये कहेंगे। परन्तु मेरे विचार से एक बजे और भी काम है। आप मुझे आरम्भ करने के लिये कुछ समय तो दें।
श्री आर. के. चौधरी : श्रीमान् आप हमें केवल विवाह तथा विवाह-विच्छेद के विषय पर बोलने की आज्ञा देंगे। हमें इसके प्रभाव का तो पता ही नहीं है। यह भी