हिंदू संहिता-(जारी) खंड 2, (संहिता की प्रयोज्य लागू होना) - जारी - Page 347

332 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

माना जाता है तो सभी समस्या खत्म हो जाएगी और मैं बैठ जाऊंगा। मान लीजिये कि यह विधेयक सदन में बहुमत या यों कहें कि हिंदू बहुमत से पारित हो जाये क्योंकि पहली बार हिंदू और सिख शब्द इस विवाह में प्रयुक्त किये जा रहे हैं और इस कानून में यही खराबी है....

डॉ. एम. एम. दास (पश्चिम बंगाल) : यह सूचना प्रश्न के लिये पूछना चाहता

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हूँ महोदय....

सरदार बी. एस. मान : क्या वह कोई व्यवस्था का प्रश्न उठा रहे हैं? अन्यथा मैं नहीं बैठ रहा हूँ।

डॉ. एम. एम. दास : क्या माननीय सदस्य केवल पंजाब के सिखों के विषय में ही बोल रहे हैं, अथवा अन्य जातियों की ओर से भी?

माननीय उपाध्यक्ष : सदस्य महोदय बैठ नहीं रहे हैं, मैं अब कोई व्यवधान सहन नहीं करूंगा।

सरदार बी. एस. मान : मुश्किल तो यह है कि विधि को अच्छी तरह न समझने वाले सदस्य बीच में व्यवधान पैदा करते हैं। जैसा कि मैं कह रहा था कि सदन में एक उत्तम परंपरा है....

माननीय उपाध्यक्ष : इस विषय पर माननीय सदस्य ने पहले ही कह दिया है, कि कोई सम्प्रदाय सम्बन्धी विधि तब तक न बनाई जाये जब तक कि इस सम्प्रदाय के लोग उसके पक्ष में न हों। इस पर सदन विचार करेगा। अब माननीय सदस्य अगले विषय को लें।

सरदार बी. एस. मान : विवाह संबंधी विधि को सामने रखते हुए हम कह सकते हैं, कि इस विधेयक के नियम बड़े कठोर हैं। मैं यहां डॉ. टेक चन्द का, जो कि एक विख्यात न्यायाधीश रहे हैं का उल्लेख करूंगा। उन्होंने इस बिंदु पर स्पष्ट रूप से विचार किया है। वह कृषि व्यवसायी भी नहीं हैं और न ही सिख हैं। वह दूसरे पेशे के हैं। परन्तु पंजाब के सिख रिवाजों से परिचित हैं। वह कहते हैं-

‘‘यह एक माना हुआ तथ्य है कि जाट खासकर जाट सिख विवाह के विषय में बड़े ही उदार विचार रखते हैं। ब्राह्मणवादी व्यवस्था के वर्चस्व काल में भी उन्होंने कठोर नियमों, जैसे कि विजातीय विवाह न करना आदि, का पालन नहीं किया। उन्होंने विवाह की दीर्घ प्रक्रिया को जो कि हिंदू स्मृति द्वारा निश्चित है, कभी नहीं माना। जाट समाज में विधवा विवाह पर भी आमतौर पर अभी रोक नहीं थी। चादर-अन्दाजी, जो विधवा-विवाह का एक रूप है और जिसकी प्रक्रिया बहुत साधारण है, उनमें एक मान्य विवाह पद्धति है।’’