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यह है दृष्टिकोण, एक न्यायाधीश का, जो कि प्रवर समिति के भी सदस्य हैं। उन्होंने अपनी असहमति टिप्पणी में लिखा है, कि यदि इस विधेयक में केवल अनुविहित विवाह ही शामिल किये गये तो हम इसके क्षेत्र के बहुत से प्रचलित तथा रिवाज पर आधारित विवाहों को बाहर कर देंगे। उदाहरणार्थ जैसे कि पंजाब में करेवा विवाह की प्रथा है- परन्तु वह धार्मिक नहीं है और आम है।
डॉ. अम्बेडकर : कौन-सा विवाह?
सरदार बी. एस. मान : करेवा, विवाह। इस विवाह में किसी पंडित पुरोहित की आवश्यकता नहीं है न ही कोई विवाह पद्धति का विधान है जैसा कि गुरुग्रंथ साहेब अथवा अग्नि के चारों ओर फेरे लेना आदि। केवल पुरुष तथा स्त्री अपने ऊपर एक चादर डाल लेते हैं- और विवाह हो जाता है। इस विवाह को चादर-अंदाजी भी कहते हैं।
श्री अमोलक चन्द (उत्तर प्रदेश) : क्या यह धार्मिक विवाह है?
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सरदार बी. एस. मान : नहीं, धर्म की परिभाषा बदलती रहती है। मनु ने धर्म की परिभाषा कुछ और की थी। अब डॉ. अम्बेडकर ने कुछ और। हम ऐसे धर्म को नहीं मानते हैं। हमारा विश्वास हमारे अपने धर्म निरपेक्ष रिवाजों पर है जो मुझे पूरी तरह स्पष्ट हैं। हम उन्हें ही प्राचीन काल से अपनाते चले आ रहे हैं।
श्री अमोलक चन्द : ऐसे विवाहों से उत्पन्न संतानें क्या वैध होती हैं? सरदार बी. एस. मान : पूरी तरह।
मैं डॉ. अम्बेडकर के उत्तर को, जो उन्होंने पहली बार दिया था जानता हूँ। उन्होंने कहा था, कि जब पंजाबी विवाह की बात करते हैं तब वह बहुत सारी अन्य बातें भी करते हैं जो....
माननीय उपाध्यक्ष : खंड 8 तथा अन्य खंड माननीय सदस्य पर आवश्यक रूप से लागू नहीं हो सकते हैं। सिख जाति में विवाह के अपने रिवाज हो सकते हैं और वे हैं। अतः इस विषय पर अधिक समय नष्ट करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
सरदार बी. एस. मान : मेरी कठिनाई यह है कि डॉ. अम्बेडकर ने कहा था, कि करेवा विवाह की आज्ञा नहीं दी जायेगी।
तत्पश्चात् खंड 8 है जो संस्कार पद्धति आदि को निश्चित करता है। मैं महोदय को बताना चाहता हूँ कि हमारे यहां करेवा से भी अधिक सादा एक और विवाह भी है।