20 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इसलिए इस अधिनियम के परन्तुकों को हिंदुओं और सिखों, बौद्धों और जैनों तक बढ़ाने का प्रयत्न किया गया है। मैं हिंदू धर्म के इतिहास में जाने की जरूरत नहीं समझता। वास्तव में एक समय जैन धर्म हिंदू धर्म के विरुद्ध एकदम भिन्न था, अगर इसका मतलब सनातन वैदिक धर्म है। जबकि सनातन वैदिक धर्म वेदों पर निर्भर हैं, जैन धर्म वेदों पर निर्भर नहीं है। इसलिए जैन और हिंदू सनातन वैदिक धर्म बिल्कुल अलग धर्म हैं।
ढाई बजे तक सदन मध्याह्न भोजन के लिए स्थगित हुआ।
ढ़ाई बजे के बाद सदन की कार्यवाही फिर से शुरू हुई।
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श्री सरवटे : जब सदन की कार्यवाही मध्याह्न भोजन के लिए स्थगित हुई तब
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मैं कह रहा था कि विधेयक में हिंदूओं के साथ अन्य धर्म के लोगों को भी जोड़ने की कोशिश की गई है। धर्म जो हिंदू धर्म के विरुद्ध और उससे भिन्न थे : अर्थात् सनातन वैदिक धर्म। उदाहरणार्थ बौद्ध धर्म हिंदू धर्म के विरुद्ध था, इसी तरह जैन धर्म था। लेकिन इन दोनों धर्मों को हिंदू संहिता विधेयक में रखा गया है। इसलिए अगर विधेयक प्रस्तुतकर्ता हिंदू धर्म के अलावा भी कुछ और धर्मों को सम्मलित करने के अधिकारी हो सकते हैं तो मैं भी कुछ और धर्मों को सम्मिलित किए जाने का प्रस्ताव रखने का अधिकारी हूँ और ऐसा करते हुए मैं विधेयक के क्षेत्र से बाहर नहीं जाऊँगा।
इसके बाद मैं यह बताना चाहता था कि विधेयक पर चर्चा करते समय हिंदू कानून में सुधार और संहिताबद्ध किया जाए, जहाँ तक मुझे याद है यह उद्देश्य और कारणों के विवरण में दिया गया है। सम्भवतः यह किसी समय या बाद में संविधान में आने वाली सम्भावना के निराकरण या हटाने की सम्भावना से किया गया है। मेरा तात्पर्य यह है कि संविधान के अनुच्छेद 25 में कहा गया है कि भारत के सभी नागरिकों को धर्म पर बराबर विचारने की स्वतंत्रता है और धर्म को मानने और प्रचार की स्वतंत्रता का अधिकार है। जैसा कि नागरिक को अपने धर्म को मानने की स्वतंत्रता है, तब उसे पूर्णरूप से अपने धर्म को नियमों के अनुसार विवाह करने की भी स्वतंत्रता होगी। लेकिन इस अधिनियम में एक विशेष प्रकार के विवाह करने के लिए बाध्य करने को कहा गया है। मेरे विचार से शायद आपत्ति का निराकरण अनुच्छेद 25 के आगे के खंड में ढूंढा जा सकता है जिसमें :-
‘‘(2) इस अनुच्छेद का प्रभाव किसी भी मौजूदा कानून या राज्य द्वारा कानून बनाने को रोकने पर नहीं होगा-’’