खंड 2 : (संहिता का प्रयोग) - Page 36

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(क) किसी आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक या किसी धर्म निरपेक्ष क्रियाकलाप जो किसी भी धर्म के अभ्यास से जुड़ा हो को नियमित करे या रोके।

(ख) लोकमानस वाले किसी हिंदू धार्मिक संस्था को हिंदुओं के सभी वर्गों और क्षेत्रीय जनों के लिए सामाजिक कल्याण और सुधार के मकसद से खोलना।

मैं अपने संशोधन के द्वारा जो कि हिंदू धर्म क्या है : मैं सुधार करना चाहता हूँ। मैं हिंदूवाद के क्षेत्र का विस्तार सभी मनुष्यों, जो भारत के नागरिक हैं जिसमें ईसाई, पारसी, यहूदी आदि भी सम्मिलित हैं तक करना चाहता हूँ।

महोदय, हिंदू कानून क्या है? हिंदू कानून को श्रुति और स्मृति अर्थात् वेदों पर आधारित कहा जाना चाहिए। आगे यह भी कहा गया है कि केवल यह ही स्रोत नहीं हैं। दूसरे स्रोत विधानसभा या विशिष्ट प्राधिकरण द्वारा पारित विधेयक हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि विधेयक और वेद का जोड़ हिंदू कानून के बराबर है। यदि ‘क’ श्रुति या स्मृति प्रस्तुत करे और ‘ख’ विधेयक प्रस्तुत करे तो हिंदू कानून ‘क’ और ‘ख’ का जोड़ होगा।

शुरू में ‘क’ का मूल्य 100 था और ‘ख’ का शून्य। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया एक के बाद एक अतिक्रमण पर अतिक्रमण हुए नतीजन स्थिति पूरी तरह बदल गई।

हिंदू धर्म का मूल आधार जाति प्रथा है और द्वितीय वह तरीका है जिससे विवाह होता है। यह पवित्र माना जाता है यह पवित्रता पर आधारित है और इस कारण इसे अटूट कहा जाता है। यह टूट नहीं सकता। जैसा कि पुरातनपंथी हिंदुओं में प्रथा है। सनातन वैदिक धर्म में पक्के तौर पर विवाह विच्छेद नहीं हो सकता। लेकिन एक के बाद एक ये आधारभूत नियम टूटते जा रहे हैं। उदाहरणार्थ विवाह विच्छेद मान्य है। कुछ जगहों पर जातियों की पूरी तरह से उपेक्षा की जाती है और इस अधिनियम में यह कहा गया है इसमें जाति नहीं होगी। इस प्रकार इस अधिनियम में सनातन वैदिक धर्म के अनुसार हिन्दुत्व का आधार नहीं रहा। इस अधिनियम में यह किया जा रहा है कि जहाँ पहले (क) 100 था और (ख) शून्य और कुल सौ था, ‘क’ घट कर शून्य हो गया और ‘ख’ बढ़कर सौ हो गया। उन दोनों कि स्थिति पूरी तरह विपरीत हो गई। जब एक समय श्रुति और स्मृति पूर्ण स्रोत थे अब विधेयक पूर्ण स्रोत होंगे और श्रुति और स्मृति शून्य। इसलिए मैं यह कहने का प्रयत्न कर रहा हूँ कि इसका लाभ केवल सनातन वैदिक धर्म को न देकर सभी को दिया जाए। मेरा उद्देश्य भारत की सीमा के अंदर सभी को समान मानना है। मैं न तो हिंदुओं में, न सिखों में, न ही किन्हीं अन्यों में भेद करना चाहता हूँ। शायद यह इंगित किया