336 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
माननीय उपाध्यक्ष : यह बात साक्ष्य विधान के उपबन्धों का उल्लंघन नहीं करती है- तथा अधिनियम के उस खंड से भी असंगत नहीं है जिस में लिखा है; कि स्त्री-पुरुष का लम्बी अवधि तक साथ रहना विवाह की मान्यता के लिये पर्याप्त प्रमाण है।
सरदार बी. एस. मान : इस विधि के लागू होने पर न्यायालय इन विवाहों पर संदेह प्रकट करेंगे तथा इन विवाहों को पंजीकृत कराना पड़ेगा। यदि माननीय विधि मंत्री यह आश्वासन दें कि उपर्युक्त प्रकार के विवाहों में किसी पक्ष को भी पंजीयक के पास नहीं जाना पड़ेगा तो मैं संतुष्ट हूँ।
श्री त्यागी : दोनों पक्ष सहमत अवश्य होने चाहिए।
सरदार बी. एस. मान : निस्संदेह! (व्यवधान) मेरे मित्र प्रो. यशवन्तराय ने इस विषय में पूछा है कि जाट सिखों तथा अनुसूचित जातियों और विशेषकर मेरी जाति में क्या ऐसे विवाह बहुतायत से होते हैं।
वर्तमान विधेयक का आशय हिंदू विधि की एक संहिता बनाना है।
यहां प्रश्न उन शादियों का है, जिनमें कोई समारोह या रस्में न होने के बावजूद उन्हें वैध मान लिया जाता है, परंतु उनके बारे में यहां प्रतिबंध लागू करने की बात की जा रही है। पंजाब में तो लोग चचेरे/मौसेरे व्यक्तियों से विवाह कर लेते हैं।
उपाध्यक्ष महोदय : इससे साक्ष्य अधिनियम के प्रावधानों का निरसन नहीं होता है और यह उस अधिनियम के इस खंड के प्रतिकूल भी नहीं है कि किसी स्त्री और पुरुष का एक साथ रहना विवाह होने का पर्याप्त प्रमाण है।
सरदार बी. एस. मान : यह कानून लागू होने के बाद ऐसी शादियों की वैधता के बारे में न्यायालयों द्वारा संदेह व्यक्त किया जाएगा और केवल इतनी ही राहत दी गई है कि विवाह पंजीकृत हो जाएगा। यदि विधि मंत्रीजी यह कह देते हैं कि ऐसी शादियां भी, जो समारोहपूर्वक नहीं हुई हैं परन्तु उनके दोनों पक्षकारों के लंबे समय तक एक साथ रहने के कारण उन्हें पति-पत्नी मान लिया जाएगा और उन्हें रजिस्ट्रार के पास जाकर अपना विवाह पंजीकृत कराने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा।
श्री त्यागी : दोनों पक्षकारों की रजामंदी होनी चाहिए।
सरदार बी. एस. मान : निःसंदेह पति और पत्नी की रजामंदी होनी चाहिए। (व्यवधान) मेरे दोस्त प्रो. यशवंत राय पूछते हैं कि क्या जाट सिखों में ऐसे मामले