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आम हैं। ऐसे मामले अनुसूचित जातियों और विषेश रूप से पंजाब में उनकी अपनी जाति में आम हैं।
प्रस्तुत विधेयक का उद्देश्य संहिताकरण करना है। संहिताकरण में कतिपय कानूनों का अस्तित्व पहले से ही मान लिया जाता है। यदि हम ईमानदार हैं और संहिताकरण करना चाहते हैं, तो मौजूदा कानूनों को उसमें शामिल किया जाना चाहिए। परन्तु प्रस्तुत विधेयक के अंतर्गत संहिताकरण केवल मौजूदा कानूनों का संहिताकरण नहीं है, अपितु जहाँ तक सिखों और पंजाब के किसानों का संबंध है, यह तो उनके कानूनों का अपवर्जन है (एक माननीय सदस्य : संशोधन) या उस सीमा तक संशोधन है कि मूल कानून पूरी तरह कहीं खो गया है और यह कुछ और ही कानून है और कई बातों के संबंध में हमारे लिए एकदम भद्दा है और हमारे ऊपर थोप दिया गया है।
वाल्टेयर ने कहा था कि :
“किसी राज्य का आकार जितना विशाल होता है और जितने समुदायों के लोग उसमें रहते हैं, एक ही न्यायशास्त्र के दायरे में उन्हें लाना उतना ही दुश्कर हो जाता है।“
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अभी दो दिन पहले ही इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कि भारत की कोई राष्ट्रीय पोशाक क्यों नहीं हैं, प्रधानमंत्री जी ने कहा था कि भारत जैसे विशाल देश में, जिसकी सीमाएं मध्य एशिया से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक फैली हुई हैं, और अलग-अलग लोगों की रीति रिवाज भी अलग-अलग हैं, इसलिए उनकी एक राष्ट्रीय पोशाक होना बहुत कठिन है। जो बात पहने जाने वाले कपड़ो पर लागू होती है वही बात कानूनी वस्त्रों पर भी लागू है जिन्हें डॉ. अम्बेडकर तैयार कर रहे हैं। पहले भी जब ऐसी कोशिश की गई थी तब ऐसी कार्रवाई की अव्यवहारिकता पर विचार करते हुए इसे छोड़ दिया गया था। पंजाब कानून अधिनियम हमारे लिए लगभग एक बाइबिल की तरह है, जिसमें परम्परागत कानून के सिद्धांत शामिल हैं; कानून का प्रस्तुत रूप जो पूरे क्षेत्र पर लागू है, वह इस अधिनियम की धारा 5 है। मैं आपको बता दूँ कि सन् 1872 से लेकर आज इतने वर्षों तक हमारे यहां यही कानून प्रचलित है और अब एकाएक इस सत्र के अन्त में, हमसे कहा जा रहा है कि हम एक ऐसा कानून स्वीकार कर लें जो न तो बहुत क्रांतिकारी है, बल्कि पूरी तरह से एक अलग और अधोगामी कानून है, और इसके परिणामों का हम सही तरीके से आकलन भी नहीं कर सके हैं। कम से कम मैं तो इसे समझ नहीं पाया हँ, क्योंकि मेरे समाज की