338 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
संरचना उŸाम परम्पराओं पर आधारित रही है और उŸाराधिकार, स्त्रियों की सम्पिŸा, विवाह, विवाह-विच्छेद, दहेज आदि के संबंध में इन्हीं को कानून माना जाता रहा है। इसमें कानून की हर बात शामिल है। इसमें कहा गया है कि :
“संबंधित पक्षकारों पर लागू कोई भी परम्परा जो न्याय, समानता और अंतःकरण के विरुद्ध न हो और जिसे इस अथवा अन्य कानून द्वारा बदला अथवा समाप्त न किया गया हो और जिसे किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा अमान्य घोषित न किया गया हो, पारम्परिक कानून होगा।”
जब उस अवसर पर ऐसा प्रयास किया जा रहा था, डॉ. अम्बेडकर जितने ही विद्वान, एक दूसरे व्यक्ति सर जॉर्ज कैम्पबेल ने, जो कानून के प्रभारी मंत्री थे, ये टिप्पणियां की थीं, जो आज भी लागू हैं। विधेयक में यह निर्धारित करने का अनुरोध किया गया है कि हिंदू कानून और मुस्लिम कानून संबंधित पक्षकारों पर लागू होने चाहिए। उसमें संशोधन भी सफलतापूर्वक किया गया था और इसलिए प्रस्तुत कानून, अर्थात् उस संशोधन पर आधारित 1872 के अधिनियम की धारा 5 अर्थात हिंदू कानून अथवा मुस्लिम कानून केवल परम्पराओं के अभाव में ही लागू होगा। सर जार्ज कैम्पबेल ने कहा था :
“यदि कौंसिल वह संशोधन स्वीकार कर लेती है, जिसकी सूचना उन्होंने दी थी तो उनका विचार है कि इस विधेयक पर कोई आपिŸा नहीं की जाएगी..... यदि इसे अधिनियमित कर दिया जाता है.... तो जिन मामलों में पक्षकार मुसलमान हैं वहां निर्णय का आधार मुस्लिम कानून और जिन मामलों में पक्षकार हिंदू हैं वहां निर्णय का आधार हिंदू कानून होना चाहिए, सिवाय उन मामलों के, जहां कानून को कानूनी अधिनियमन द्वारा बदला अथवा समाप्त कर दिया गया हो अथवा अधिनियम के प्रावधानों के विरुद्ध हो। वह इस बात को स्वीकार करने के इच्छुक थे कि हिंदू और मुस्लिम कानून से लिए गए कतिपय सरल नियम पंजाब में कुछ सीमा तक माने जाते हैं परन्तु उन्हें ऐसा प्रतीत होता है कि इस प्रकार की धारा के कारण पंजाब में न केवल उस प्रांत का सरल कानून आ जाएगा, बल्कि लिखित हिंदू और मुस्लिम कानूनों की समस्त जटिलताएं और देश भर के न्यायालयों द्वारा निर्णित अलग-अलग कानून भी आ जाएंगे। इस बात की उन्हें अत्यधिक आशंका है। वे ऐसा मानते है क्योंकि इससे न केवल वकीलों के लिए दरवाजे खुल जाएँगे बल्कि इसलिए कि यह पंजाब का कानून ही नहीं है। हिंदू और मुस्लिम कानून के कड़े प्रावधानों से पंजाब का दस में से एक नहीं बल्कि सौ में से एक व्यक्ति भी शासित नहीं है।”