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संहिताबद्ध करने का एक प्रयास तब भी किया गया था, परन्तु क्या मैं यह कह सकता हँ कि संहिताबद्ध करना कानून को कठोर बना देता है जबकि परम्परा कठोर नहीं होती है? संहिताकरण और कानूनी विनियमन ऊपर से आते हैं जबकि परम्पराएं समुदाय के रहन-सहन की स्थितियों और विवेक का प्रतिनिधित्व करती हैं। पारम्परिक कानून का विकास और सुदृढ़ता का कारण यह है कि वह समुदाय के भीतर से होता है और उसमें उत्तरोत्तर प्रगति होती है; यह अधिनियमित कानून की तरह प्रतिक्रियावादी नहीं होता है, जो प्रगति को कुंठित करता है अधिनियमित कानून जहां वृद्धि को कुंठित करता है वहीं पारम्परिक कानून सर्वोत्तम बातों और स्थिति की व्यवहार्यता को आत्मसात करता है।
अपनी बात समाप्त करते हुए मैं यही कहूँगा कि जो लोग संहिताकरण की इस किस्म में विश्वास रखते हैं उन्हें इसके खतरों के प्रति भी सचेत रहना चाहिए, जिनके कारण समुदाय का विकास, उसके निर्णय की स्वतंत्रता और इच्छा शक्ति होती है जो लोगों की बदलती आवश्यकताओं और भावनाओं के अनुसार बदलती है। मैं डॉ. अम्बेडकर की कानूनी कपड़े तैयार करने, कानूनी जामा तैयार करने की योग्यता एक किस्म की अमृतधारा है जो दक्षिण से लेकर उत्तर तक के सभी रोगों पर कारगर होती है- का पूरा सम्मान करते हुए यह कहना चाहूँगा कि जो कपड़े वे तैयार कर रहे हैं और सिल रहे हैं, वे दक्षिण भारतीयों के लिए या तो बहुत ढीले-ढाले होंगे या उत्तर भारतीयों के लिए कुछ ज्यादा ही चुस्त होंगे। बेहतर यही होगा कि वे मेरे साइज की ओर देखें : समाज के आकार और जरूरतों को देखें और उस हिसाब से कपड़े तैयार करें और सिलें और मुझे सिले-सिलाए कपड़े न दें, तैयार दवाई- प्रत्येक रोग के लिए अमृतधारा जैसी कोई तैयार दवाई न दें। मेरी गुजारिश है कि एक सिख होने के नाते कोई ऐसा कानून मुझ पर लादने की कोशिश न की जाए जो मेरे लिए अनजान और मेरी भावना के विरुद्ध हो। कम से कम मैं तो उसे स्वीकार नहीं करूंगा और न कभी उसका सम्मान करूंगा, क्योंकि पुरातनपंथी ब्राह्मणों का मैंने सम्मान नहीं किया है और किसी आधुनिक ब्राह्मण का मैं सम्मान भी नहीं करूंगा।
* पंडित मालवीय : जहां तक हिन्दू कोड बिल का संबंध है इस पर बहस के
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किसी भी चरण में मैंने अब तक सदन में अपना कोई विचार नहीं रखा है। अब तक मैं आशा करता था कि ऐसा दुर्दिन कभी नहीं आएगा जब हमें इस तरह के किसी प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार-विमर्श करने की जरूरत होगी। इस सदन के और इस
* संसदीय वाद-विवाद, खंड XV भाग II, 19 सितंबर, 1951 पृष्ठ 2872-96