342 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
में हिन्दू कोड बिल के समर्थन में जीत जाते हैं....
एक माननीय सदस्य : क्या उत्तर भारत मेंं?
पंडित मालवीय : पूरे देश में कहीं भी यदि वे जीत जाते हैं तो मैं अपना विरोध छोड़ने के लिए तैयार रहूँगा।
श्री मुनावल्ली (बम्बई) : चुनौती स्वीकार है।
उपाध्यक्ष महोदय : तस्वीर के दो पहलू होते हैं। उन्हें आगे बोलने दीजिए।
पंडित मालवीय : टोकाटाकी से मैं विचलित नहीं होता हूँ। शब्द दो प्रकार के होते हैं। एक शब्द वह होता है जो मात्र ध्वनि होता है; दूसरे प्रकार के शब्द वह हैं, जिनका कोई अर्थ होता है और जब कोई सदस्य कहता है कि “चुनौती स्वीकार है“ मैं चाहूँगा कि वह सार्थक हो और मात्र ध्वनि नहीं हो।
श्री मुनावल्ली : मेरा यही मतलब है।
पंडित मालवीय : मेरा निवेदन इस प्रकार है। सरकार और विधि मंत्री इस विधेयक पर मतदान कराएं और यदि वे ऐसा कराने के इच्छुक हों तो मैं प्रस्ताव करना चाहता हँ - और आशा करता हँ कि मेरी तरह महसूस करने वाले अन्य सदस्य भी इस बात से सहमत होंगे कि चुनाव से पहले एक सप्ताह में एक विचार सत्र का आयोजन करें; जब उप चुनाव के परिणाम घोषित हो जाएं तो परिणाम के अनुसार कार्य करें। लेकिन जो सदस्य कहते हैं कि उन्हें चुनौती स्वीकार है, तो उनके प्रति किसी अपमान की भावना के बिना मैं कहूँगा कि वे यह जानते हैं कि उनके लिए परीक्षा की घड़ी कभी नहीं आएगी। इनमें से एक तरीके से ही हम इस मामले में कोई निर्णय ले सकते हैं और यही एकमात्र रास्ता है। यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो मैं नहीं जानता कि मेरे बयान पर लगा प्रश्नचिह्न कैसे स्वीकार किया जाएगा कि अब तक इस देश के लोग बहुमत से इस विधेयक के प्रावधानों के सर्वथा विरुद्ध हैं (एक माननीय सदस्य : प्रश्न)। जब मैं यह कहता हूँ तो मैं केवल उन लोगों की बात नहीं करता हूँ जिन्हें “पुरातनपंथी“ कहा जाता है, बल्कि मैं इस देश के प्रगतिशील लोगों में से सबसे प्रगतिशील लोगों की भी बात कर रहा हूँ ; उन लोगों की जो समय और इस राष्ट्र के बड़े-बूढ़ों द्वारा हम पर लगाए गए प्रतिबंधों के सामने अपने आपको कमजोर और असहाय महसूस करते हैं, जो एक आसान जीवन-शैली की कामना करते हैं, जो अपने लिए दुनिया की हर अच्छी बात हासिल कर लेना चाहते हैं जो मानव इतिहास के अज्ञात क्षीण अतीत की सहस्राब्दियों से लेकर युगों-युगों से हमारे ऊपर लगे प्रतिबंधों और बंधनों से मुक्त होना चाहते हैं; एक पूरी नस्ल की