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परम्पराओं, संस्कृति, जीवन, विचारधारा, सिद्धांतों से, जिनके बारे में अनादि काल से परम्परा के रूप में चले आने का दावा किया जाता है। वे लोग आज अधीर हो रहे हैं और मैं यह निवेदन करना चाहता हूँ कि उनके दृष्टिकोण से, और मौजूदा प्रतिबंधों से अधीर लोगों के नजरिए से भी, जो कहते हैं कि हमारा समाज कहीं और स्थित किसी समाज अनुकरण कर रहा है चाहे वह नकल हमारी बुद्धिमत्ता के अनुरूप है अथवा नहीं; उन्हें भी यह विधेयक स्वीकार्य नहीं हो सकता है। इसी आधार पर मैं यह दावा करता हूँ कि इस देश के लोगों का बहुमत इस विधेयक के विरोध में है। पुरातनपंथी लोग, जिनकी जड़ें पुरानी परम्पराओं में हैं, इससे व्यथित हैं। परन्तु वे लोग जिन्हें कुछ हद तक सामाजिक स्वतंत्रता प्राप्त है ....
डॉ. एम. एम. दास : व्यवस्था का एक प्रश्न है। माननीय सदस्य वही दोहरा रहे हैं, जो वे इस सदन में पहले ही कह चुके हैं; उनके पास कहने के लिए नया कुछ नहीं है; वे वही दोहरा रहे हैं, जो दूसरे सदस्य कह चुके हैं।
पंडित मालवीय : मैंने सुन रखा था कि एक किस्म के लोग जो आदतन नशे में जकड़े होते हैं, उनके सामने स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ रखे जाने पर भी उन्हें उबकाई आती है ! मेरे माननीय मित्र पर मुझे कोई हैरत नहीं है !
श्री भारती : यदि माननीय सदस्य अपनी टिप्पणी विचाराधीन विषय अर्थात् विवाह और विवाह-विच्छेद तक सीमित रखें तो क्या इससे बात स्पष्ट नहीं होगी ?
पंडित मालवीय : अपने मित्र श्री भारती जितनी स्पष्टता और योग्यता शायद मुझमें नहीं है।
उपाध्यक्ष महोदय : मैं स्वयं भी माननीय सदस्य को सुझाव देना चाहता था कि अब जबकि बहस का दायरा विवाह और विवाह-विच्छेद तक सीमित है, अतः उनकी टिप्पणी भी वहीं तक सीमित रहनी चाहिए। माननीय सदस्य शायद महसूस करते होंगे कि उनके द्वारा प्रस्तुत मुद्दे उतने जोर देकर प्रस्तुत नहीं किए गए थे, जितना वे अब कर रहे हैं। बहरहाल, कुछेक मुद्दों पर चर्चा की जा चुकी है; उन्हें उन पर विस्तार से बताने की आवश्यकता नहीं है और उन्हें अपनी टिप्पणी अनछुए मुद्दों पर ही सीमित रखनी चाहिए।
श्री आर. के. चौधरी : मैं ससम्मान उल्लेख करना चाहूँगा कि चाहे कुछ दोहराव ही क्यों न हो; हम पंडित मालवीय जैसे विद्वान व्यक्ति का अभिमत अवश्य जानना चाहेंगे।
डॉ. एम. एम. दास : यह विशेषाधिकार की बात है - माननीय सदस्य एक सदस्य