22 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जाए कि मैं इस विधेयक का क्षेत्र विस्तार उन लोगों तक बढ़ाने का प्रयत्न कर रहा हूँ जिन्हें जाँचा नहीं गया। उदाहरणार्थ ईसाई और पारसी की जाँच नहीं हुई जो उचित नहीं होगा। मेरा उत्तर है कि सिखों को भी सम्मलित करना उचित नहीं होगा क्योंकि उनकी भी जाँच नहीं हुई। इसलिए न्यायसंगत होने के लिए भूल विधेयक के परन्तुकों और जो संशोधन मैं प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहा हॅँ में बहुत अंतर नहीं है। तर्कसंगत तरीका यही होगा कि लोगों की जाँच की जाए जिनकी पहले जाँच नहीं हुई और उनकी राय जानी जाए। अगर आवश्यकता हो तो विधेयक को रोक दिया जाए या ऐसा करने के लिए वापस कर दिया जाए।
इस विधेयक में प्रमुख दावा यही किया जाता है कि वह निष्पक्ष, न्याय और नैतिक मूल्यों की सद्भावना पर आधारित है। मान लो उदाहरणार्थ यह कहा जाए, एक मनुष्य के तीन बेटे और तीन बेटियाँ हैं। अगर वह अपने बेटों को प्यार करता है तो उसी तरह अपनी बेटियों को भी प्यार करता है। क्योंकि माता-पिता ने उन्हें जन्म दिया है। अगर बेटों को उत्तराधिकार मिलता है, तो यह बात बेटियों पर भी लागू होती है क्योंकि उन्हें भी माँ-बाप ने जन्म दिया है, उन्हें भी उत्तराधिकार होना चाहिए। यही अकेला कारण है जिसे बेटियों को उत्तराधिकार देने के लिए आगे बढ़ाया जा सकता है, मतलब उसे भी माँ-बाप ने जन्म दिया है और इसीलिए उसे भी पिता की सम्पत्ति में अवश्य हिस्सा मिलना चाहिए। फिर यह अधिकार केवल हिंदुओं के मामलों में ही सही नहीं है। परन्तु मुसलमान और सिखों के मामलों में भी है, ईसाई और दूसरों के लिए भी ऐसा ही होना चाहिए। इसलिए अगर कानून में संशोधन होता है तो यह केवल हिंदुओं पर ही नहीं बल्कि सभी नागरिकों पर, जो हमारी न्यायिक परिधि जिनके लिए भी हम विधेयक बना सकते हैं लागू होना चाहिए।
यहाँ मुझे बहुत अच्छा समर्थन प्राप्त है। जो डॉ. अम्बेडकर ने विधेयक के पहले चरण में कहा था मैं उनका उदाहरण दूँगा- मैं इस सदन की कार्यवाही की रिपोर्ट के पृष्ठ उठाकर उनका उदाहरण दे रहा हूँः-
‘‘अगर मेरे माननीय दोस्त का विकल्प यह था कि उत्तराधिकार कानून और विवाह कानून सांप्रदायिक नहीं होना चाहिए। लेकिन समान नागरिक संहिता हो, जो सभी वर्गों, समुदायों, वास्तव में सभी नागरिकों पर बिना धर्म, जाति, वर्ग के भेदभाव के लागू हो तो मैं इससे सहमत हूँ।’’
यह उन्होंने हिंदू संहिता विधेयक के पहले चरण की बहस के दौरान कहा था।
एक माननीय सदस्य : उन्होंने अपनी राय बदल ली है।
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श्री सरवटे : उन्हें अपने शब्दों पर अडिग रहना चाहिए।