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गुण-दोषों पर मैं अपना कोई मत व्यक्त नहीं कर रहा हूँ। मैं केवल इतना भर उल्लेख कर रहा हँ कि आज गांवों में रहने वाले सीधे सादे पुरूषों को, जिन्हें मेरे आदणीय मित्र माननीय विधि मंत्री जी जैसे समाज के अन्य सदस्यों के समान बौद्धि क, नैतिक, भावनात्मक और आध्यात्मक प्रगति का अवसर और लाभ प्राप्त नहीं हुआ है, उन्हें कुछ मामलों में अन्य लोगों के समान संयम की आदत अच्छी और बेहतर बात के बीच, बद और बदतर के बीच भेद कर पाने की आदत सामान्यतः नहीं होती है। हिन्दू समाज समूहों में बंटा हुआ है, जिसका किसी वर्ग को क्षति पहुंचाने अथवा किसी वर्ग पर कोई अन्याय करने का अमानवीय अथवा विद्वेषपूर्ण उद्देश्य नहीं है। मैं नहीं चाहता कि कोई यह गलतफहमी रखे कि मेरा मानना यह है कि इसके कुछ वर्गों पर अन्याय नहीं हुआ है। अन्याय हुआ है, अत्याचार किया गया है, पाशविक अत्याचार किया गया है और ऐसा कोई भी समझदार व्यक्ति नहीं जो इस बात से इंकार करे। लेकिन मैं उन सिद्धांतों और मोटी-मोटी अवधारणाओं की बात कर रहा हूँ, जिन पर विभाजन आधारित था। उनका उद्देश्य नुकसान पहुचाना नहीं था, उनका मकसद कोई अत्याचार करना नहीं था।
श्री मुनावल्ली : लेकिन इसका प्रभाव क्या हुआ है?
पंडित मालवीय : प्रभाव का वर्णन करने में बहुत समय लगेगा क्योंकि प्रभाव
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युग-दर-युग अलग-अलग रहता आया है और अगर मेरे माननीय मित्र इतिहास के पन्ने पलटकर उन्हें पढ़ने की जहमत उठाएं तो वे खुद बहुत कुछ समझ जाएंगे।
उपाध्यक्ष महोदय : लेकिन क्या विवाह और विवाह-विच्छेद के लिए इस बात पर बहस जरूरी है?
पंडित मालवीय : मैं जो उल्लेख करना चाहता हूँ वह यह है कि बात चाहे जैसी
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हो, हम एक व्यक्ति से एक बात की और दूसरे व्यक्ति से दूसरी बात की उम्मीद कर सकते हैं। अगर आज कोई दुरूह कानूनी बात उठती है तो इसके सभी पहलुओं पर रोशनी डालने के लिए हम अपने विद्वान विधि मंत्री जी से सहज और कानूनी तौर पर अनुरोध कर सकते हैं। आप ऐसी जानकारी और ऐसी रोशनी मुझ जैसे अज्ञानी व्यक्ति से हासिल नहीं कर सकते हैं। (एक माननीय सदस्य : नहीं, नहीं) (दूसरे माननीय सदस्य : यह तो विनम्रता है )। इसी प्रकार से और भी कोई विषय हो सकता है जिसके बारे में दूसरा व्यक्ति कई बातें बता सकता है, परन्तु जिसके बारे में मेरे प्रिय और विद्वान मित्र श्री भारती अज्ञानी सिद्ध हो सकते हैं। इस समाज में लोगों का ऐसा भी वर्ग है, जिनके लिए जीवन का वास्तविक उत्साह, अस्तित्व का वास्तविक उत्साह घंटे-दर-घंटे, सुबह से शाम और फिर शाम से सुबह उनके सम्पूर्ण अस्तित्व का एक