हिंदू संहिता-(जारी) खंड 2, (संहिता की प्रयोज्य लागू होना) - जारी - Page 362

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(व्यवधान) किसी ने मुझसे पूछा है कि मुझे ईर्ष्या क्यों है ? दुर्भाग्य से या सौभाग्य से मैं ऐसी मिट्टी का बना ही नहीं हँ कि मुझे माननीय विधि मंत्री जी से ईर्ष्या करने का सौभाग्य प्राप्त हो।

डॉ. अम्बेडकर : एक ब्राह्मण को एक अछूत से भला ईर्ष्या कैसे हो सकती है?

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पंडित मालवीय : बेहतर होगा कि आप उन्हें बताएं ! मुझे एक श्लोक याद

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आता है जिसमें कुम्भकर्ण रावण से पूछता है (व्यवधान)। यदि माननीय सदस्य सुनें कि श्लोक में क्या कहा गया है तो वे स्वयं को एक बेहतर मनुष्य महसूस करेंगे। कुम्भकर्ण रावण से पूछता है कि सीता के मन को जीतने के प्रयास में उसके सामने जाते हुए अपना रूप परिवर्तित करने की समस्त मायावी शक्तियों से वह राम का ही रूप क्यों नहीं धर लेता और इस पर रावण कहता है - समस्या यह है कि जब भी मैं राम का रूप ले लेता हूँ या उसका स्मरण करता हूँ तो कोई कलुषित विचार मेरे मन में आना ही असंभव सा हो जाता है ! (सुनिए, सुनिए) (माननीय सदस्य : कृपया श्लोक दोहराएं) मैं अनेक श्लोक दोहराऊंगा यदि माननीय सदस्य इसके लिए मुझे समय दें। इसी प्रकार मनु के बारे में- मैं कह रहा था कि यदि हम इस सदन के सदस्यों से किसी बात की उम्मीद कर सकते हैं- निःसंदेह, कुछ ही मिनटों में उनके विवाह विच्छेद पर बहस कर लेने की कोई संभावना नहीं हो सकती है- हम उम्मीद नहीं कर सकते हैं कि वे 80 प्रतिशत लोग भी यही करेंगे। अतः इस मामले में हमें सावधानी बरतनी चाहिए। यदि कोई उस पहलू का खण्डन करता है तो मैं उसके विचार सुनना चाहूँगा।

इसलिए मैं अपनी बात दुहराता हूँ कि इस विधेयक को न केवल लोगों के पुरातनपंथी वर्ग ने अस्वीकार कर दिया है, बल्कि इस देश के निवासियों के एक बड़े तबके ने भी अस्वीकार कर दिया है (कुछ माननीय सदस्यः नहीं, नहीं) कोई कहता है कि “जो कारण आपने बताए हैं उनसे इतर कारणों से”। यह हो सकता है, परन्तु बात वही है कि कारण चाहे जो कुछ भी हो, लोगों के एक बडे़ तबके ने इसे स्वीकार नहीं किया है।

अब मैं इस विधेयक की बात करूंगा। यह कहा गया है कि चूँकि इस विधेयक के केवल भाग II पर विचार किया जाना है अतः अब यह जरूरी नहीं कि इसे हिन्दू कोड बिल कहा जाना चाहिए। चाहे इसमें दूसरे अंश अपवर्जित किए गए हों अथवा न किए गए हों, यदि इसे हिन्दू कोड बिल नहीं कहा गया होता तो मुझे आपत्ति नहीं थी। हमने अपने संविधान में अपने देश को “इण्डिया अर्थात् भारत” कहा है। इस विधेयक को “भारतीय कोड” क्यों नहीं कहा गया? मैं यह सवाल नहीं उठा रहा हूँ कि