348 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
यह सभी पर लागू होना चाहिए। मेरा इससे कोई संबंध नहीं है। मैं यह उस आधार पर नहीं कह रहा हूँ। परन्तु इस देश को “भारत” कहा जाता तो इसका अर्थ और मंतव्य भिन्न होता। जब हम “हिन्दू कोड” कहते हैं तो उस शब्द से जो अभिप्राय है उसकी तस्वीर सामने आती है। अतः हमें समझना चाहिए और ध्यान रखना चाहिए कि “हिन्दू” शब्द से क्या अभिप्राय है। इस शब्द को एक वाक्य में स्पष्ट करना बहुत ही कठिन है। परन्तु हिन्दू धर्म की एक विशेषता है जिसे उसकी विशिष्टता कहा जा सकता है तो वह है इसके तंत्र की अपार सहिष्णुता और उदारता। खुद हमारे प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी हिन्दू धर्म की बात करते हुए कहा था कि इसके बारे में कहा जा सकता है कि यह ‘जियो और जीने दो’ के सिद्धांत पर आधारित है। हम हिन्दुओं के बीच परस्पर विरोधी विचारधाराएं हैं। हमारे पास उन्नत पौराणिक साहित्य और छह दार्शनिक शाखाएं हैं, जिनमें से एक मैं जैमिनी, शंकर और कुमारिल जैसे दार्शनिकों की कुशाग्र बुद्धिमत्ता एवं विदग्धता हैं- मैं इन मनीषियों की प्रशंसा में कोई विशेषता प्रयुक्त नहीं कर रहा हूँ क्योंकि उनके लिए उपयुक्त शब्द ढूँढ पाना दुष्कर होगा- तो दूसरी ओर इसमें एक दूसरी प्रणाली है जो इतनी कुंठित है, इतनी अपरिष्कृत हैं जो अपनी आंखों से देखे बिना किसी बात को देखने और समझने से भी इंकार करती है। बेचारा चार्वाक मुंह के सामने हथेली रखे है और इस बात से इंकार करता है कि उसका पृष्ठभाग भी अस्तित्व में है, क्योंकि यह प्रत्यक्ष नहीं है....
डॉ. एम. एम. दास : यह व्यवस्था का प्रश्न है। यहां हम हिन्दू दर्शन और प्राचीन ऋषियों पर कोई भाषण सुनने नहीं आए हैं।
उपाध्यक्ष महोदय : आर्डर, आर्डर। मैं देख रहा हूँ कि माननीय सदस्य बहुत अधीर हैं। विरोधी दृष्टिकोण पर भी उन्हें विचार करना चाहिए। मैंने उम्मीद नहीं की थी कि माननीय सदस्य टोकाटाकी करते रहेंगे। मैंने बार-बार कहा है कि यह एक विवादास्पद विषय है और हम पर्याप्त समय दे रहे हैं। मैं यह भी जानता हूँ कि अनेक माननीय सदस्य बोल चुके हैं। मैं अभी बहस का समापन नहीं कर रहा हूँ। टोकाटाकी जितनी कम होगी उतनी ही जल्दी वे अपनी बात पूरी करेंगे। अन्यथा वे और समय मांगेंगे।
पंडित मालवीय : मैं तो केवल हिन्दुओं के बीच व्याप्त व्यापक विविधता और दार्शनिक एवं तात्विक उदारता का उल्लेख कर रहा था। मैं समझता हूँ कि किसी को भी किसी बात के दार्शनिक पहलू के बारे में बात करने की आवश्यकता नहीं है। काश, सब यह महसूस कर पाते कि यह सब अनावश्यक है। लेकिन ऐसी टिप्पणियां से प्रतीत होता है कि दुर्भाग्यवश यह अत्यंत आवश्यक हैं। मैं उल्लेख कर रहा था