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कि एक ओर जहां शुद्ध वेदांत है तो दूसरी ओर दार्शनिक चार्वाक हैं जो पांच मकारों में लिप्त हैं। मैं इन पांच मकारों का वर्णन नहीं करूंगा.... कुछ माननीय सदस्य : बोलिए, बोलिए।
पंडित मालवीय : ........क्योंकि शालीनता के अपने कारणों के अलावा, मैं समझता हूँ कि संभवतः वे सदस्य जो दार्शनिक विचारों में गहरी दिलचस्पी न रखते हों, परन्तु उससे अवगत जरूर होंगे।
उपाध्यक्ष महोदय : वह सब इस विषय पर हो रही चर्चा में उपयोगी किस प्रकार है?
पंडित मालवीय : मैं यह बताने का प्रयास कर रहा था कि ....
डॉ. अम्बेडकर : मैं कहता हूँ कि ‘मकार’ उपयोगी हैं।
उपाध्यक्ष महोदय : क्या यह किसी भी प्रकार से ‘मकार’ के खिलाफ हैं।
पंडित मालवीय : यह वैविध्य तो हमारे प्रमुख दर्शनों में भी है। इनमें आस्तिक दर्शन भी है और नास्तिक दर्शन भी। हमारे कुछ दर्शनों में परब्रह्म एवं ब्रह्म तथा जीव के एकेष्वरवादी सिद्धांत की बात कही गई है और कुछ में अब्रह्म एवं अवेद तथा निरीश्वर रूपी नास्तिक दर्शन की बात की गई है। हमारे यहां पर अन्य क्षेत्रों में भी इसी प्रकार की मतभिन्नता और विविधता मौजूद है। आज कुछ लोगों के लिए हमें यह स्मरण कराना फैशन बन गया है कि कुछ ऋषि एवं अन्य कुछ लोग गौमांस का भक्षण भी करते थे। इसके साथ ही हिन्दू धर्म में गाय सार्वभौमिक रूप से आदरणीय है। हिन्दू समाज में विवाह समारोह उत्साहपूर्वक संपन्न किया जाता है; तो हमारे हिन्दू समाज में युवा संन्यासी भी हैं। हिन्दू समाज में अतिसंयमी एवं कल्पनातीत ढंग से कठिन तपस्या भी है; तो हिन्दू समाज में अत्यंत विलासप्रियता एवं अत्यधिक इन्द्रिय विषय सुख भी हैं। हिन्दू समाज में ब्राह्मण भी है और चाण्डाल भी; वह चाण्डाल नहीं जिसके लिए केवल निषेध और प्रतिबंध हैं बल्कि वह चाण्डाल जिसके लिए अधिकार एवं विशेषाधिकार भी निर्धारित हैं, ठीक वैसे ही जैसे ब्राह्मणों के लिए हैं (व्यवधान)।
उपाध्यक्ष महोदय : किसी व्यक्ति को अब चाण्डाल या अछूत कहना संविधान के अन्तर्गत अपराध है।
पंडित मालवीय : महोदय, कई वक्ता यहाँ एक साथ बोल रहे हैं इसलिए मैं आपको सुन नहीं पा रहा हूँ।