350 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
उपाध्यक्ष महोदय : किसी संवैधानिक पहलू को छोड़कर चाण्डाल का उल्लेख करना अब उचित नहीं है। इसे संविधान के अंतर्गत अपराध करार दिया गया है।
डॉ. देशमुख : वह तो केवल इतिहास का संदर्भ दे रहे हैं।
उपाध्यक्ष महोदय : कुछ इतिहास हो सकता है परन्तु समस्त इतिहास उल्लेख योग्य नहीं होता। बेहतर होगा कि कुछ इतिहास हम भुला दें।
पंडित मालवीय : मैं इसका उल्लेख व्यिंक्त के लिए नहीं परन्तु अतीत में प्रचलित प्रणाली के तौर पर कर रहा था। बहरहाल, आपने जो कुछ भी कहा है मैं उसका अनुपालन करूंगा।
डॉ. अम्बेडकर : आप क्यों करेंगे ?
पंडित मालवीय : माननीय विधि मंत्री जी पूछते हैं कि मैं क्यों करूंगा। क्योंकि मैं कानून का पालन करने वाला सदस्य हूँ, न कि वह जिसका उल्लेख मैंने किया था।
मैं निवेदन कर रहा था कि अनेक प्रकार की व्यवस्थाएं हिन्दू समाज में एक साथ सम्मान और शांतिपूर्वक चल रही थीं। यह हिन्दू धर्म की महती विशेषता रहती आई है। परन्तु वह उदारता और वह सहिष्णुता संभव थी क्योंकि इन समस्त बातों का आधार कुछ मूल सिद्धांत और आधारभूत तत्व थे जिनका सबसे पहले निर्धारण एवं संविधान किया गया था और जिनका पालन किसी प्रश्न या विवाद के बिना युगों-युगों से किया जाता रहा था; जो कोई संकीर्ण साम्प्रदायिक सिद्धांत अथवा रस्में नहीं थी; न ही कोई विवादास्पद बातें या नियम; बल्कि वे कतिपय आधारभूत थे, जिन्हें समाज के निरन्तर, स्थिर और सुचारू अस्तित्व की अनिवार्य शर्त माना जाता था। इन सिद्धांतों को किसी भी नाम से पुकारा जा सकता है परन्तु यही एक चिरस्थायी आधारशिला है जिस पर एक स्वस्थ समाज टिका होना चाहिए। इस देश में इन सिद्धांतों को ’सनातन’ नाम दिया गया था - सनातन से सदैव परिवर्तनशील और नित्य नूतन अभिप्रेत नहीं है जैसा कि एक विद्वान वक्ता ने कल कहा था; बल्कि इससे वह अभिप्रेत है जो सदैव अस्तित्व में रहा है। इसलिए यदि हम हिन्दू समाज की संरचना में कोई भी परिवर्तन लाने का कार्य शुरू करते हैं, तो हमें सावधानी बरतनी होगी कि हम चाहे इसके बाह्य रूप और तामझाम से, पत्तियों और शाखाओं से चाहे जितनी छेड़छाड़ कर लें लेकिन वृक्ष की जड़ पर ही कुल्हाड़ी न चला दें; उसे झिंझोड़ न दें; हम उन आधारभूत तत्वों और मूल सिद्धांतों को उखाड़ न दें, जिन पर समाज आधारित है और जिन्होंने समय के झंझावातों से इसकी रक्षा की है क्योंकि विश्व में मनुष्य को ज्ञात किसी अन्य समाज की रक्षा किसी और ने नहीं की है। इसलिए हमें सर्वप्रथम वे मूलभूत सिद्धांतों को समझना होगा।