351 12.00 बजे मध्याह्न
....मुझे कुछ आश्चर्य हुआ था जब मैंने तीन विभूतियों, जिनसे मिलकर आज इस देश की सरकार बनी है, से सुना कि प्रस्तावित हिन्दू कोड बिल में निहित प्रावधान हिन्दू शास्त्रों में जो कुछ है, उनके अनुसार हैं। मैंने यह भी कहते सुना कि इस विधेयक को इस रूप में प्रस्तुत करने के उद्देश्य से उन शास्त्रों का गहन अध्ययन भी किया गया है। स्वाभाविक है कि कोई भी ऐसे विद्वान प्रकृति वाले व्यक्तियों के साथ दो-दो हाथ करने में झिझकेगा। परन्तु हिन्दू शास्त्र तो युगों-युगों से विश्व की संपत्ति रहे हैं। अनेक लोगों ने उन्हें पढ़ा है और उन्हें पढ़ सकते हैं। सौभाग्य से उनका जितना भी सीमित ज्ञान मुझे है, अब तक इस वक्तव्य के लिए कोई औचित्य ढूँढना मेरे लिए संभव नहीं हो सका है। अतः मैं सुझाव दूँगा कि यदि सरकार का दावा है कि वह हिन्दू कोड बिल को हिन्दू शास्त्रों में निहित प्रतिबंधों के आधार पर तैयार कर रही है तो हमें इसी विचार पर आगे बढ़ना चाहिए। लेकिन यह बात अलग होगी यदि एक व्यापक वैचारिक दृष्टिकोण अपनाया जाता है और कहा जाता है कि हिन्दू शास्त्र नहीं, उनमें निहित प्रतिबंध नहीं बल्कि यह इस विधेयक के निर्माताओं की बुद्धि और मनमानी है, यह उनका झुकाव और आकांक्षा है जो इसके पीछे हैं, वही इसके खण्डों और ब्यौरे को तैयार करने वाले निर्धारक कारक हैं। मेरी सर्वात्तम जानकारी के अनुसार ऐसा कोई वक्तव्य अब तक नहीं दिया गया है। अतः मैं इसी अवधारणा के आधार पर आगे बढूँगा कि दावा यही है कि यह विधेयक और इसके प्रावधान हिन्दू शास्त्रों पर आधारित हैं। यदि ऐसी बात है तो मैं विधि मंत्री जी से इस बात का स्पष्टीकरण चाहूँगा कि किसी विषय विशेष पर हिन्दू शास्त्रों में क्या कहा गया है और शास्त्रों में उस वक्तव्य से क्या अभिप्रेत है। मैं जानता हूँ कि मैं जो कुछ कह रहा हूँ वह विधि मंत्री जी जैसे विद्वान व्यक्ति के लिए व्यर्थ समय गंवाने के समान है क्योंकि मुझे इसमें संदेह नहीं कि वे जानते हैं कि मैं जो कह रहा हूँ उससे क्या अभिप्रेत है। लेकिन हम, इस संसद के सदस्य एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर कानून तैयार करने के लिए यहां आए हैं और यदि हम ऐसे सार्वभौमिक महत्व के मामले पर कानून तैयार करने जा रहे हैं और यदि हम किसी सिद्धांत के आधार पर यह कर रहे हैं अर्थात हिन्दू शास्त्रों के सिद्धांतों के अनुसार ऐसा किया जा रहा है तो मैं महसूस करता हूँ कि हमारा यह कर्त्तव्य है कि इस सदन के सदस्य होने के नाते हम उन नियमों, विधियों और मान्य प्रक्रियाओं को ध्यान में रखें, जिनके द्वारा शास्त्रों और उनके शब्दों को अर्थ निरूपण और व्याख्या की जाती है। मीमांसा उसी उच्च प्रयोजन के लिए प्रयुक्त होती है क्यांकि हिन्दुओं जैसे समाज में कानून किसी सरकार या किसी मंत्री से नहीं आया है, चाहे वह कितना ही उच्च पदस्थ एवं शक्तिशाली क्यों न हो........