352 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
श्री सिद्धवा (मध्यप्रदेश) : कृपया अध्यक्ष को सम्बोधित करें।
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पंडित मालवीय : मेरे माननीय मित्र श्री सिद्धवा मुझे अध्यक्ष को सम्बोधित करने
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के लिए कह रहे हैं। मैं कुछ और नहीं कर रहा। मैं चाहता हूँ श्री सिद्धवा इतनी आसानी से इसे न भूलें।
इस सदन के सदस्यों को समझना चाहिए कि हिन्दुओं जैसे समाज में जहां सब कुछ किन्हीं ग्रंथों पर आधारित है केवल ईश्वर जानता है कि कितने लाख वर्षों से या हजार या हजारों वर्षों से जो युगों-युगों से हमारे पास हैं, जब हमारे पास कोई प्रिटिंग प्रेस या कागज नहीं था, जब सब कुछ केवल स्मृति में रखना होता था, और इसे शिक्षक से शिष्य को और जनक से आत्मज को प्रदान किया जाता था, जहां हर बात उचित उच्चारण एवं स्वर शैली तथा उचित ग्रंथ और प्राचीन व पुरातन शब्दों एवं मंत्रों की सही व्याख्या पर निर्भर होती थी, जहां नई-नई संहिताएं एवं विवेचनात्मक ग्रन्थ कागज पर मुद्रित नहीं हुए अपितु समय-समय पर मनुष्य के मस्तिष्क एवं स्मृतियों में आए जिन्हेंं उनका समुचित महत्व और स्थान प्रदान किया जाना था; ऐसे समाज में उन ग्रंथों की व्याख्या के लिए यदि सूक्ष्मतम, व्यापक और सकारात्मक नियमों का निर्धारण नहीं किया गया होता तो आपदा आ जाती। और मीमांसाओं में हमने निर्धारण किया है कि किसी श्रुति अथवा स्मृति की व्याख्या किस प्रकार की जानी चाहिए। यह भी निर्धारित किया गया है कि कानून का अर्थ किसी एक स्थान पर मात्र एक वाक्य देखकर निकाला नहीं जा सकता है। इसके लिए अनेक परीक्षण निर्णायक परीक्षण करने होते हैं।
(पंडित ठाकुर दास भार्गव पीठासीन हुए)
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अतः यदि सरकार का यह दावा है कि हिन्दू कोड बिल हिन्दू शास्त्रों के नियमों और सिद्धांतों पर आधारित है तो मेरा विनम्र अनुरोध यह है कि हम सावधानीपूर्वक और नियमानुसार विभिन्न प्रावधानों की जांच करें और देखें कि क्या वे हिन्दू शास्त्रों में निहित अथवा निर्धारित किसी बात का उल्लंघन करते हैं। मेरा विनम्र निवेदन यह है कि वे न केवल हिन्दू शास्त्रों के अनुरूप नहीं हैं, बल्कि उनके ठीक विपरीत हैं (व्यवधान)। कोई पीछे से कह रहा है कि अब मैं ज्यादा बोल रहा हूँ। काश, मेरे वह मित्र समझा पाते कि यदि मैं इन सिद्धांतों पर विस्तारपूर्वक बोलूँ तो मुझे समापन करने में कई दिन लग जाएंगे।
श्री मुनावल्ली : आपका मंतव्य भी यही है।
पंडित मालवीय : हम सर्वज्ञ की अवधारणा जानते हैं। मुझे लगता है उसका एक
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नया रूप यहां है जो दूसरों का मन पढ़ लेता है।