हिंदू संहिता-(जारी) खंड 2, (संहिता की प्रयोज्य लागू होना) - जारी - Page 369

354 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

इस स्थिति में हमें और कुछ कहने की आवश्यकता नहीं रहेगी। इसके बाद हम इसे माननीय विधि मंत्री जी पर छोड़ सकते हैं। मैं यह पूरा मामला एक अम्पायर या जज के रूप में उनके हाथों में सौंप सकता हूँ, न केवल उन लोगों की ओर से जो इस कोड के पक्ष में हैं, बल्कि मेरे जैसे उन लोगों की ओर से भी जो यह चाहते हैं कि वे इन खण्डों का शास्त्रों के अनुसार मदवार अध्ययन करें, मीमांसा के माध्यम से उनकी व्याख्या करें और कोड के प्रावधानों पर उन्हें लागू करें और यह बताएं कि क्या वे परस्पर विरोधी हैं। यदि वे ऐसा कहते हैं तो मैं संतुष्ट हो जाऊंगा और आगे कोई विरोध नहीं करूंगा। मैं नहीं समझता कि इसे और अधिक उचित या समुचित कुछ कहा जा सकता है। यदि ऐसा नहीं किया जा सकता तो हम कम से कम इतनी अपेक्षा तो कर ही सकते हैं कि यह दावा पूरी तरह छोड़ दिया जाए और वापस ले लिया जाए कि हिन्दू कोड बिल में जो प्रावधान शामिल हैं वे सभी शास्त्रों में कही गई बातों पर आधारित हैं ताकि हमारे लाखों लोग जिन्हें ऐसे वक्तव्यों के आधार की समालोचनात्मक दृष्टि से विवेचन करने का अवसर नहीं मिला है, ऐसे पूरी तरह गलत और भ्रामक वक्तव्यों से गुमराह न हों और इस खतरनाक गड्ढे में गिर न पड़ें। यह विधेयक संभवतः नेकनीयती से तैयार किया गया है, परन्तु इसमें शरारत की अकथनीय और अथाह संभावनाएं हैं। यदि यह भी नहीं किया जा सकता है तो इस सदन के सदस्यों के लिए अथवा मेरी तरह महसूस करने वालों के लिए इन सभी प्रस्तावों की शास्त्रों में उनके बारे में कही गई बातों के सन्दर्भ में विस्तृत जांच करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है। यह एक लम्बी प्रक्रिया होगी क्योंकि यदि यह दावा किया जाता है कि जो कुछ कहा गया है वह कहीं न कहीं निर्धारित बातों के अनुसार है तो इसे केवल पारस्परिक सहमति से माना जा सकता है अथवा अभिमत के अनुसार नहीं बल्कि तथ्यों की अकाट्यता के अनुसार; और उन तथ्यों से अभिप्रेत है कि प्रत्येक खण्ड और प्रत्येक उप-खण्ड पर, प्रत्येक विषय और लगभग प्रत्येक शब्द पर इस सदन का ध्यान हिन्दुओं के अनेकानेक शास्त्रों और कानूनी ग्रंथों के संबंधित पाठों की ओर आकृष्ट करने का अवसर और लाभ इस सदन को प्राप्त होना चाहिए। मैं नहीं जानता कि क्या इसे संभव समझा जाएगा; मुझे संदेह नहीं कि यह अनुमत्य होना चाहिए; लेकिन मैं नहीं जानता कि क्या इसे संभव और व्यावहारिक समझा जाएगा। अतः मैं न केवल हमारे विचारधीन विषय की निष्पक्षता और न्याय व इससे प्रभावित लोगों के हित में, बल्कि इस सदन में इस विधेयक की प्रगति के हित में भी सरकार से अनुरोध करता हूँ कि वह उक्त मुद्दे पर अपनी वैचारिक स्थिति पर पुनर्विचार करें और विश्व के समक्ष यह घोषणा करने का निर्णय लें कि हिन्दू कोड हिन्दू शास्त्रों पर आधारित नहीं है और उनमें क्या लिखा है इसकी उसे परवाह नहीं है और यह उन लोगों की बुद्धि और कल्पना