हिंदू संहिता-(जारी) खंड 2, (संहिता की प्रयोज्य लागू होना) - जारी - Page 370

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की उपज है जिन्होंने इसे तैयार किया है; अथवा वह मेरी सुझाई प्रक्रिया को अपनाएं अर्थात् प्रत्येक खण्ड की विस्तृत और निष्पक्ष जांच कराएं और फिर केवल उन्हीं को इस संसद के समक्ष प्रस्तुत करें जिनके बारे में सर्वसम्मति है कि वे शास्त्रों के अनुसार हैं और लम्बे समय से प्रचलन में हैं।

इस मामले में कुछ और भी कठिनाईयाँ हैं। अब यह कहा गया है कि इस विधेयक का दायरा केवल विवाह और विवाह-विच्छेद विषयों तक ही सीमित रहेगा। परन्तु मेरी कठिनाई यह है कि मात्र इस तथ्य से इस प्रश्न के स्वरूप में थोड़ा भी अन्तर नहीं आता है। यदि इस विधेयक का कोई भाग होता जो पूर्णत : अविवादित होता और यदि उस पर विचार-विमर्श किया जाता, तो मैं जानता हूँ कि इसे किसी कठिनाई या विवाद के बिना इस सदन द्वारा पारित कर दिया जाता। परन्तु क्या हिन्दुओं के विवाद के नियमों में परिवर्तन करने से ज्यादा आधारभूत और ज्यादा विवादास्पद बात कुछ हो सकती है ? मेरा निवेदन है कि इससे अधिक विवादास्पद विषय के बारे में सोचना संभव नहीं है। कोई कह सकता है कि इस विधेयक के दूसरे भाग अधिक विवादास्पद हैं - मैं जानता हूँ कि कोई और भी उतना ही जोर देकर कहेगा कि विवाह और विवाह-विच्छेद से संबंधित भाग सबसे अधिक विवादास्पद है। अतः यह कहने से कि इस विधेयक की प्रगति इन भागों तक ही सीमित रहेगी, प्रश्न के आधारभूत पहलू में कोई परिवर्तन नहीं होता है। अतः इस संबंध में हमें आगे बढ़ते हुए बहुत सावधान रहना होगा। मैंने उल्लेख किया था कि अधिकांश लोग इसके विरोध में हैं परन्तु इसकी स्थिति में भी एक बुनियादी गलती है। यह मामला जब पिछली बार सदन में आया था तब स्वयं विधि मंत्री जी ने एक माननीय सदस्य के प्रश्न का उत्तर देते हुए एक बार कहा था कि उस समय मंतव्य नहीं था कि यह विधेयक तत्कालीन भारतीय राज्यों के लोगों पर लागू किया जाना चाहिए। और अपने आमतौर पर सावधानी और विचारपूर्वक दिए गए उत्तर में उन्हांने कहा था कि जब कभी राज्यों की बात आती है तो यह मामला उठाने से पहले इस पर अच्छी तरह विचार करना होगा- या ऐसा ही कुछ उन्होंने कहा था; मैं उनके शब्द उद्धृत नहीं कर रहा हूँ। हर कोई जानता है कि यह विधेयक उन राज्यों के राजपत्र में प्रकाशित नहीं किया गया है। यह भारत सरकार के राजपत्र में प्रकाशित किया गया था, यह कुछेक प्रांतों के राजपत्र में प्रकाशित था, परन्तु इसका कोई प्रयोजन नहीं समझा गया, अतः इसे उन राज्यों के राजपत्र में प्रकाशित नहीं किया गया। अतः राज्यों के लोगों से इस मामले पर विचार करने की अपील नहीं की गई ; दरअसल उन्हे इससे कोई सरोकार भी नहीं था। इसका परिणाम क्या हुआ है ? आज हमारे नए संविधान के कारण वह समस्त राज्यक्षेत्र इस भूभाग का हिस्सा है और आज जो कुछ पारित किया जाता है वह उन सभी क्षेत्रों के लोगों पर लागू होगा। क्या