हिंदू संहिता-(जारी) खंड 2, (संहिता की प्रयोज्य लागू होना) - जारी - Page 371

356 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

किसी ने रुककर इस स्थिति के हास्यास्पद स्वरूप पर विचार किया है ? इस देश का एक तिहाई न कि यहां या वहां का कोई हिस्सा लेकिन इस विशाल देश का पूरा एक तिहाई........

श्री मुनावल्ली : ऐसा नहीं है क्योंकि अनेक राज्य प्रांतों में शामिल किए जा चुके हैं।

पंडित मालवीय : मेरे मित्र कहते हैं कि “ऐसा नहीं है, क्योंकि अनेक राज्य प्रांतों में शामिल किए जा चुके है।“ मैं इस बयान पर कोई विवाद करने की हिम्मत नहीं करता, लेकिन मेरा विचार है कि उनके शामिल किए जाने से पहले और उनका विलय किए जाने के बाद विधेयक का प्रकाशन कहीं पर भी किया गया है। श्री मुनावल्ली : प्रश्न।

पंडित मालवीय : मेरे मित्र उस वक्तव्य पर प्रश्न कर रहे हैं। वे मुझसे कहीं आगे हैं। मैं कहता हूँ और दोहराता हूँ कि इस महान उप महाद्वीप पर एक ऐसा कानून लागू होने जा रहा है, जो उसके लोगों को उसे देखने को अवसर दिए बिना उनके जीवन और अस्तित्व के आधार को ही गहराई से प्रभावित करने वाला है।

श्री लक्ष्मणन (त्रावणकोर-कोचिन) : मैं उल्लेख करना चाहता हूँ कि कुछ राज्यों

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में यह विधेयक प्रकाशित किया गया था उदाहरण के लिए त्रावणकोर-कोचीन।

श्री भारती : मुझे हैरानी है कि क्या माननीय सदस्य दूसरे राज्यों के बारे में भी जानते हैं?

पंडित मालवीय : मैं उस विचारधारा का हिमायती नहीं हूँ जिसमें अपनी हथेली के अलावा कुछ और नहीं देखा जाता। टोकाटाकी पर मुझे कोई आपत्ति नहीं है क्योंकि मैं जानता हूँ कि मैं क्या कह रहा हूँ और उसका तात्पर्य क्या है। मैं मात्र इसलिए नहीं बोल रहा कि मैं कुछ कहना चाहता हूँ या मुझे किसी को खुश करने के लिए कुछ कहना चाहिए लेकिन जो कुछ मैं कहता हूँ उसमें मेरा दृढ़ विश्वास है। चाहे कितनी भी टोकाटाकी हो, चाहे कितनी ही बार “प्रश्न” कहा जाए, सत्य को डिगाया नहीं जा सकता है। यदि कोई बात सच्ची और सही है, तब चाहे कोई भी कुछ भी कह ले, ये “प्रश्न” केवल बात को स्पष्ट करने में सहायक होते हैं।

श्री जे आर कपूर : व्यवधान सहायक होता है।

पंडित मालवीय : चाहे वे सहायता की भावना से हों अथवा न हों, मैं उनसे किंचित भी व्यथित नहीं होता। इतने महत्वपूर्ण और गंभीर मामले पर यदि किसी के मन में