359
पंडित मालवीय : मेरी सम्मानीय बहन कहती है कि “आइये, हम आने वाले हजार वर्षों के लिए ब्राह्मणवादी समाज की नादिरशाही को बनाए रखे रहें।” मैं केवल यही कामना और प्रार्थना कर सकता हूँ कि हजार वर्षों के लिए ही नहीं अपितु चिरकाल तक केवल मेरी प्यारी बहन ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व का उत्कर्ष ब्राह्मण सिद्धांत की अवधारणा के स्तर तक हो - यह वह सिद्धांत है जो सबके लिए निष्पक्षता और न्याय का पक्षधर है, जो स्वयं के अधिकारों और विशेषाधिकारों पर जोर देने के बजाए दूसरों के प्रति अपने कर्त्तव्यों और कर्मों के निष्पादन का पक्षधर है, जो विवर्धन के जीवन का नहीं, आत्महित के जीवन का नहीं, निम्न विचारों और निम्न जीवन का नहीं बल्कि उदात्त एवं उच्च सिद्दांतों और व्यावहारिक निःस्वार्थता का आदेश देता है, जहां समाज के किसी और सदस्य के बजाए स्वयं ब्राह्मण और सचमुच न केवल ब्राह्मण, बल्कि समाज का प्रत्येक सदस्य आत्मत्याग करता है आत्म उपेक्षा करता है, दुःखों का वरण करता है ताकि अन्य लोग आगे बढें़, समृद्धि प्राप्त करेंं और जीते रहें। मैं जानता हूँ कि मेरे माननीय मित्रों में से कुछेक इस अवधारणा के सौन्दर्य और उदात्तता से अनभिज्ञ हैं (सुनिए, सुनिए) मैं आशा और प्रार्थना करता हूँ समाज और मानवता का अभी भी नैतिक, सामाजिक, आध्यात्मिक और वैचारिक उत्कर्ष होगा जहाँ ब्राह्मण एक सच्चा ब्राह्मण होगा और समाज के सभी सदस्यों का उत्कर्ष उस युग के स्तर तक होगा। मैं इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर रहा हूँ कि और दूसरे लोगों की तरह ब्राह्मण की अवनति हुई है........
श्रीमती दुर्गाबाई : कथनी और करनी दोनों में।
श्री आर. के. चौधरी : महिला सदस्य टोकाटाकी क्यों कर रही हैं ?
पंडित मालवीय : वे मेरी बहन है और हम चाहे अलग-अलग माता-पिता से उत्पन्न हुए हों, परन्तु वे मेरे लिए सगी बहन के समान हैं क्योंकि हम एक ही संस्था से उत्पन्न हुए हैं। मेरी बहन कहती है कि ब्राह्मण को कथनी और करनी दोनों में ऊँचा उठना चाहिए। मैं पूरे हृदय से और मेरा रोम-रोम प्रार्थना करता है कि ऐसा ही हो और इसके साथ दो अन्य लोगों के साथ भी ऐसा ही हो।
डॉ. अम्बेडकर : इस बीच आइये, हम हिन्दू कोड पर बात करें।
पंडित मालवीय : यदि हम उस शुद्ध और उदात्त ब्राह्मणीय आदर्श तक ऊंचा उठ सकें तो हिन्दू समाज की समस्त पीड़ा और दुःख न केवल समाप्त हो जाएंगे बल्कि वह फिर से मानवता में अग्रणी बन जाएगा जैसा कि एक समय वह था; उस समय नहीं जब समाज के किसी वर्ग द्वारा दूसरे पर अन्याय और क्रूरता की जाती थी बल्कि उस समय जब प्रत्येक सदस्य........