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पर लागू कर सकते हैं जिन्हें पहले भारतीय राज्य कहा जाता था। उस प्रक्रिया को पूरा करने के बाद; अर्थात् इसे वहां प्रकाशित और परिचालित किया जाता है और संबंधित विधानमंडल यह निर्णय ले लेते हैं कि यह उन पर लागू होना चाहिए।
एक और कठिनाई है, जो मैं महसूस करता हूँ और वह इस प्रकार है कि जब पहली बार हिन्दू कोड तैयार किया गया था, उस समय देश में लागू संविधान के अनुसार कृषि सम्पत्ति वह विषय नहीं था जिस पर केन्द्रीय विधानमंडल कानून बनाता था। इसके परिणामस्वरूप इस देश की 90 प्रतिशत या शायद उससे अधिक भू-सम्पत्ति इसके क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत नहीं आती थी। (उपाध्यक्ष महोदय पीठासीन हुए)
अब कृषि सम्पत्ति को भी समवर्ती सूची में रख दिया गया है और यह कानून, यदि पारित कर दिया जाता है, तो यह देशभर की भू-सम्पत्ति पर भी लागू होगा। अतः इस विधेयक का दायरा लगभग 900 गुना बढ़ा दिया गया है। जिस स्थिति में यह पहले था उस समय इसका सरोकार राष्ट्र की सम्पत्ति के बहुत छोटे से हिस्से से होता।
उपाध्यक्ष महोदय : अब यह इस विधेयक की विषय-वस्तु नहीं है, क्या माननीय सदस्य का विचार है कि विवाह के परिणामस्वरूप बच्चों को उसकी भी पात्रता होगी?
पंडित मालवीय : मैं इस समय इस विधेयक की प्रयोज्यता और इसके मंतव्य की बात कर रहा हूँ। मैं उल्लेख कर रहा था कि ........
उपाध्यक्ष महोदय : स्पष्ट है कि माननीय सदस्य यहां नहीं थे। हमने कहा है कि यह विधेयक विवाह और विवाह-विच्छेद तक सीमित है। सम्पत्ति, विरासत, उत्तराधिकार पर अभी विचार नहीं किया जाना है, चाहे माननीय सदस्य अप्रत्यक्ष रूप से यह कहें कि विवाह के परिणामस्वरूप सन्तान उत्पन्न होंगी और वह भू-सम्पत्ति की हकदार हो सकती हैं।
पंडित मालवीय : महोदय मुझे वही कठिनाई है जो मुझे पहले आई थी। अनेक वक्ता बोल रहे हैं और मैं आपकी बात सुन नहीं सका था !
उपाध्यक्ष महोदय : सम्पत्ति से संबंधित अध्याय और अन्य भागों को विधेयक के दायरे से अभी बाहर रखा गया है। हम अभी केवल विवाह और विवाह-विच्छेद तक ही सीमित हैं। इस लिए माननीय सदस्य अभी उस मामले को बीच में न लाएं।