हिंदू संहिता-(जारी) खंड 2, (संहिता की प्रयोज्य लागू होना) - जारी - Page 380

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दें तो मैं दूसरे तरीके से कहता हूँ; मैं यथासंभव संक्षेप में कहने का प्रयास करूँगा। यदि आप चाहते हैं कि मैं संक्षेप में बात करूँ तो कल मैं केवल दो मुद्दों अर्थात् विवाह और विवाह-विच्छेद तक ही सीमित रहूँगा और जितनी जल्दी हो सके, अपनी बात समाप्त करूंगा। हो सकता है कि मुझे ........

डॉ. अम्बेडकर : पांच घंटे लगें।

पंडित मालवीय : वे पांच दिन से पांच घंटे पर आ गए हैं। महोदय क्या आपका विचार है कि यह अनुचित है ? मैं अपनी बात संक्षेप में कहने का प्रयास करूँगा। मैं मजाक में नहीं कह रहा हूँ। मैं यथासंभव संक्षेप में अपनी बात कहूँगा, शायद दो या ढाई घंटे में।

श्रीमती रेणुका रे : मैं एक प्रश्न पूछना चाहती हूँ। महोदय, यह खण्ड 2 प्रयोज्यता से संबंधित है। मैं आपसे फिर पूछना चाहती हँ कि क्या विचार-विमर्श चरण समाप्त होने पर हम विवाह और विवाह-विच्छेद के पूरे विषय पर चर्चा कर सकते हैं ?

उपाध्यक्ष महोदय : माननीय सदस्य बार-बार मेरा विनिर्णय चाहती हैं। मैं केवल इतना कहना चाहता हूँ कि क्या चर्चा के अन्त में निर्णय देना आवश्यक है ? बहरहाल इतनी बात तो स्पष्ट है। माननीय सदस्य कल अपना भाषण जितनी शीघ्रता से संभव हो, समाप्त करेंगे। जहाँ तक इस मामले का संबंध है और उनका भाषण समाप्त होने पर मैं तुरन्त आधे घण्टे की चर्चा शुरू कराऊंगा और वह 1.30 बजे तक चलेगी। मेरा विचार था कि यदि आज हम आधा घण्टा बैठते हैं तो माननीय सदस्य पंडित मालवीय अपनी बात समाप्त कर लेंगे लेकिन इसके कोई आसार दिखाई नहीं देते हैं। इसलिए कल यदि वे कुछ और समय भी ले लेते हैं तो उसके तुरंत बाद मेरा माननीय विधि मंत्री को आमंत्रित करने का विचार है।

श्री बी. दास (उड़ीसा) : महोदय, सुधारवादी इस सदन में चुपचाप बैठे हुए हैं। मेरे मित्रों सरदार मान और पंडित मालवीय ने दो बेबाक लेकिन विचारोत्तेजक भाषण दिए हैं। इसलिए सरकार की ओर से अपने अंतिम उत्तर में डॉ. अम्बेडकर को जो कुछ कहना है, उसके अलावा आप कृपया हमें, जिनका इस सदन में बहुमत है, कुछ कहने की अनुमति देंगे। माननीय सदस्यगण : जी हां।

श्री श्यामनन्दन सहाय : जी, हां। सदन के पितृ पुरूष को एक अवसर तो दिया ही जाना चाहिए।

श्री शिवचरण लाल (उत्तर प्रदेश) : महोदय कुछ संशोधन हैं, जिन पर हम लोग

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