हिंदू कोड-जारी - Page 388

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मैं केवल दूसरे महत्वपूर्ण पहलू की बात सरसरी तौर पर करूंगा अर्थात् जो विधेयक हमारे समक्ष अभी है इसमें इतना बदलाव किया गया है कि जब इसे पहली बार प्रस्तुत किया गया था, उसके मुकाबले इसे पहचाना ही नहीं जा सकता। यह नियम है कि चयन समितियों को अपनी रिपोर्टां के अन्त में उल्लेख करना चाहिए कि उन्होंने विधेयक में इतना ही परिवर्तन किया है कि उसका वास्तविक स्वरूप परिवर्तित नहीं हुआ है और यह कि संशोधित विधेयक का पुनः परिचालन अथवा पुनः प्रकाशन जरूरी नहीं है। इससे यह सिद्धांत सिद्ध होता है कि यदि चयन समिति विधेयक में पर्याप्त परिवर्तन करती है तो इसे पुनः प्रकाशित और पुनः परिचालित किया जाना चाहिए। मेरा निवेदन है कि कानून तैयार करने संबंधी मामलों में हमें नियमों की पुनीतता का ध्यान रखना चाहिए क्योंकि नियम शांतिपूर्ण क्षणों में और निष्पक्षतापूर्वक विचार करके तैयार किए जाते हैं; न कि किसी घटना, विषय या किसी दृष्टिकोण के बरक्स, और कानून बनाते समय विधिवत सावधानी, विचार और चौकसी बरतने की बुनियादी जरूरत भी सुनिश्चित की जाती है। अतः ऐसे नियम अत्यन्त बहुमूल्य होते हैं और किसी भी देश की स्वस्थ संसदीय परम्पराओं और संस्थाओं के लिए वह दुर्दिन ही होगा यदि हम किसी विशेष मुद्दे या विशेष घटना को अपने अभिमत की सुविधानुरूप उन्हें आसान बनाने लगेंगे। अतः मैं अब यह महसूस करता हूँ कि इस विधेयक में इतना बदलाव कर दिया गया है कि अब संवैधानिक तौर पर इस पर या इसके किसी भाग पर आगे बढ़ने का कोई औचित्य नहीं है क्योंकि इसे उस प्रक्रिया का अनुपालन किए बिना तैयार कर दिया गया है। उस मुद्दे को भी मैं यहीं छोड़ता हूँ।

मैं अब केवल एक या दो बातों का उल्लेख और करूंगा, और अपना स्थान ग्रहण करूँगा। अनेक मित्रों ने, जो इस विधेयक के समर्थक हैं, कहा था कि यह विधेयक स्मृतियों और धर्मशास्त्रों के सिद्धांतों के अनुसार तैयार किया गया है। यदि मेरे पास समय होता तो इस दावे का खोखलापन सिद्ध करने के लिए मैं विभिन्न स्मृतियों और धर्मशास्त्रों के अंश उद्धृत करता। अब मैं यह नहीं कर सकता हूँ। इसलिए अब मैं सीधे इस में शामिल दो महत्वपूर्ण सिद्धांतों पर आता हूँ - एक तो सपिण्ड प्रतिबंधों के स्तर का प्रश्न और दूसरा प्रश्न कि क्या हिन्दुओं में विवाहित महिला का पुनर्विवाह हो सकता है।

इन दोनों मुद्दों पर कुछ स्मृतियों को उद्धृत किया जा चुका है। जहां तक सपिण्ड संबंध का प्रश्न है, यह तर्क प्रस्तुत किया गया है कि समय-समय पर स्मृतियों में विभिन्न सिद्धांत निर्धारित किए गए हैं, कि एक स्मृति में एक बात कही गई है तो दूसरी स्मृति में दूसरी बात कही गई है और इससे यह निष्कर्ष निकालने का प्रयास